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Showing posts from February, 2026

'साधु सिंह' (कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर' द्वारा) रेखाचित्र की समीक्षा

'साधु सिंह' (कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर' द्वारा) रेखाचित्र की समीक्षा कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर' (1906-1995) हिंदी के प्रमुख निबंधकार, रेखाचित्रकार एवं पत्रकार थे। उनका रेखाचित्र 'साधु सिंह' एक विशिष्ट चरित्र-चित्रण है, जो सामाजिक मानदंडों से हटकर एक स्वतंत्रचेता, विलक्षण व्यक्तित्व को प्रस्तुत करता है। 1. विषय-वस्तु एवं चरित्र: · यह रेखाचित्र साधु सिंह नामक एक ऐसे व्यक्ति का जीवंत चित्रण है जो बाहरी रूप से साधारण, परंतु आंतरिक रूप से असाधारण दार्शनिक दृष्टि रखता है। · वह पारंपरिक 'साधु' या 'संत' की परिभाषा पर खरा नहीं उतरता, बल्कि एक सांसारिक साधु है जो गृहस्थी में रहते हुए भी आध्यात्मिक ऊँचाई रखता है। · उसका जीवन सरलता, ईमानदारी, निर्भीकता और आत्मसन्तोष का प्रतीक है। 2. शिल्पगत विशेषताएँ: · रेखाचित्र की संरचना: मिश्र जी ने साधु सिंह के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से उभारा है। रेखाचित्र आत्मकथ्य शैली में लिखा गया प्रतीत होता है, जिसमें लेखक का साधु सिंह के साथ सान्निध्य झलकता है। · भाषा-शैली:   · सहज, व्...

लल्लु कब लौटेगी' (बनारसीदास चतुर्वेदी) रेखाचित्र की समीक्षा

'लल्लु कब लौटेगी' (बनारसीदास चतुर्वेदी) रेखाचित्र की समीक्षा बनारसीदास चतुर्वेदी (१८९२-१९८५) हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार, सम्पादक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका रेखाचित्र 'लल्लु कब लौटेगी' एक मार्मिक, सामाजिक यथार्थवादी और मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत रचना है। 1. विषय-वस्तु एवं कथानक: · यह रेखाचित्र एक गरीब, साधनहीन परिवार की बालिका लल्लु के इर्द-गिर्द घूमता है, जो अपने परिवार की आर्थिक मदद के लिए बचपन में ही पड़ोस के एक संपन्न घर में नौकरानी बन जाती है। · कथानक लल्लु के बचपन के शोषण, उसकी मासूम इच्छाओं, और उसकी विवशताओं को चित्रित करता है। लेखक की दृष्टि में लल्लु कोई नौकरानी नहीं, बल्कि एक बच्ची है जिसका बचपन छीन लिया गया है। · केंद्रीय प्रश्न "लल्लु कब लौटेगी?" उसकी मुक्ति की आकांक्षा और उसके परिवार की बेबसी को व्यक्त करता है। 2. शिल्पगत विशेषताएँ: · रेखाचित्र का स्वरूप: चतुर्वेदी जी ने रेखाचित्र की संक्षिप्तता, प्रभावशीलता और मनोवैज्ञानिक गहराई का सुंदर उपयोग किया है। थोड़े में ही पूरा चरित्र और सामाजिक परिदृश्य उभर आता है। · भाषा-शैली: सरल, सहज, संवादात्मक ...

सिनेमा जगत का वैश्विक बाजार: एक विश्लेषण

सिनेमा जगत का वैश्विक बाजार: एक विश्लेषण सिनेमा का वैश्विक बाजार एक जटिल और गतिशील पारिस्थितिकी तंत्र है, जहाँ फिल्म निर्माण, वितरण, प्रदर्शन और उपभोग की प्रक्रियाएँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आपस में जुड़ी हुई हैं। इसे निम्नलिखित आयामों से समझा जा सकता है: 1. बाजार का आकार एवं प्रमुख केंद्र: · प्रमुख उद्योग: हॉलीवुड (अमेरिका) दुनिया का सबसे बड़ा और प्रभावशाली फिल्म उद्योग बना हुआ है, जो वैश्विक बॉक्स ऑफिस का एक बड़ा हिस्सा हासिल करता है। · उभरते बाजार:   · भारत (बॉलीवुड + क्षेत्रीय उद्योग): दुनिया में सबसे अधिक फिल्में निर्मित करने वाला और टिकट बिक्री के मामले में अग्रणी देश।   · चीन: दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फिल्म बाजार, जो तेजी से विकास कर रहा है और अब हॉलीवुड फिल्मों से प्रतिस्पर्धा कर रहा है।   · नाइजीरिया (नॉलीवुड): अफ्रीका का प्रमुख और विश्व में फिल्म उत्पादन की संख्या के हिसाब से अग्रणी उद्योग।   · दक्षिण कोरिया, जापान, यूरोप (फ्रांस, जर्मनी, यूके) भी महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। 2. वितरण एवं प्रदर्शन के चैनल: · पारंपरिक थिएटर: मल्टीप्लेक्स चेन (जैसे AMC, Cineworld, ...

साहित्यिक पत्रिकाओं का विश्व जाल (वर्ल्ड वाइड वेब)

साहित्यिक पत्रिकाओं का विश्व जाल (वर्ल्ड वाइड वेब) से तात्पर्य उस वैश्विक, अंतर्संबंधित डिजिटल नेटवर्क से है, जिसके माध्यम से दुनिया भर की साहित्यिक पत्रिकाएँ (लिटरेरी मैगज़ीन्स/जर्नल्स) ऑनलाइन प्रकाशित, प्रसारित, पढ़ी और आपस में जुड़ी हुई हैं। यह जाल निम्नलिखित आयामों से बना है: 1. वैश्विक पहुँच एवं दृश्यता: · सीमाओं का अभाव: पहले पत्रिकाएँ केवल स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर तक सीमित थीं, अब इंटरनेट के जरिए वे पूरी दुनिया में पाठकों तक पहुँचती हैं। · खोज योग्यता: गूगल, विशेष साहित्यिक डेटाबेस (जैसे JSTOR, Project MUSE) और सोशल मीडिया के माध्यम से पत्रिकाएँ आसानी से खोजी जा सकती हैं। 2. बहुभाषिक एवं बहुसांस्कृतिक आदान-प्रदान: · विश्व के कोने-कोने से साहित्य (कविता, कहानी, आलोचना, निबंध) एक-दूसरे की भाषाओं में अनूदित होकर पहुँच रहा है। · उदाहरण: लैटिन अमेरिकी, यूरोपीय, एशियाई और अफ्रीकी पत्रिकाएँ एक-दूसरे से जुड़कर सांस्कृतिक आदान-प्रदान कर रही हैं। 3. डिजिटल स्वरूपों की विविधता: · ऑनलाइन-केवल पत्रिकाएँ: जैसे – Granta, The Paris Review (ऑनलाइन संस्करण), Electric Literature। · प्रिंट एवं डिज...

उदय प्रकाश: जीवन परिचय

उदय प्रकाश: जीवन परिचय उदय प्रकाश (जन्म: 1 जनवरी, 1952) हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार, कवि, पत्रकार, अनुवादक, पटकथा लेखक एवं सामाजिक चिंतक हैं। वे समकालीन हिंदी साहित्य की एक प्रमुख और विशिष्ट आवाज़ हैं, जिनकी रचनाएँ यथार्थ के जादुई आवरण और गहन सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी के लिए विख्यात हैं। उनकी कहानियाँ और उपन्यास वैश्वीकरण, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के युग में मानवीय मूल्यों के संकट को बहुत ही कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। --- प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा: · जन्म: 1 जनवरी, 1952 को सीतापुर, अनूपपुर जिला, मध्य प्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) में। · शिक्षा: उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उनकी पीएच.डी. का विषय था – "हिंदी में जनवादी कविता और नागार्जुन"। कार्यक्षेत्र: · उन्होंने दूरदर्शन में नौकरी की और साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। वे जनसत्ता, दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान जैसे प्रमुख समाचार पत्रों से जुड़े रहे। · उन्होंने इग्नू (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय) में अध्यापन भी किया। · वे भारतीय जन नाट्य सं...

मंगलेश डबराल: जीवन परिचय

मंगलेश डबराल: जीवन परिचय मंगलेश डबराल (16 मई, 1948 – 9 दिसंबर, 2020) हिंदी के प्रसिद्ध कवि, पत्रकार, अनुवादक एवं सामाजिक चिंतक थे। वे समकालीन हिंदी कविता की एक प्रमुख और संवेदनशील आवाज़ थे, जिनकी रचनाएँ सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ और गहन मानवीय संवेदना के बीच एक सटीक संतुलन बनाती हैं। --- प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा: · जन्म: 16 मई, 1948 को काठगोदाम, नैनीताल (उत्तराखंड) में। · शिक्षा: उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिंदी) की उपाधि प्राप्त की। · उनके साहित्यिक व्यक्तित्व पर उत्तराखंड की प्राकृतिक पृष्ठभूमि और 1970-80 के दशक की राजनीतिक-सामाजिक चेतना का गहरा प्रभाव था। कार्यक्षेत्र: · उन्होंने जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान और भास्कर जैसे प्रमुख हिंदी समाचार पत्रों में कार्य किया और एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में ख्याति अर्जित की। · उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र 'सारिका' का संपादन भी किया। · वे साहित्यिक-सामाजिक विमर्शों में सक्रिय रहे और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे। साहित्यिक विशेषताएँ एवं रचना-संसार: 1. काव्य भाषा एवं शिल्प:    · उनकी काव्य-भाषा स्पष्ट, ठोस, बिंबा...

राजेश जोशी: जीवन परिचय

राजेश जोशी: जीवन परिचय राजेश जोशी (जन्म: १९ जुलाई, १९४६) हिंदी के प्रसिद्ध कवि, पत्रकार, अनुवादक और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। वे समकालीन हिंदी कविता के एक प्रमुख और प्रतिबद्ध हस्ताक्षर माने जाते हैं, जिनकी रचनाएँ सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और गहन दार्शनिकता का अनूठा संगम हैं। --- प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा: · जन्म: १९ जुलाई, १९४६ को नयागाँव, सागर जिला, मध्य प्रदेश में। · शिक्षा: उन्होंने ऐरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया, लेकिन रुचि साहित्य में होने के कारण उन्होंने इंजीनियरिंग छोड़कर सागर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. किया। · बाद में उन्होंने पत्रकारिता को अपने अभिव्यक्ति के मुख्य माध्यम के रूप में चुना। कार्यक्षेत्र: · उन्होंने दिनमान, रविवार और जनसत्ता जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं एवं समाचार पत्रों में काम किया और एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में ख्याति अर्जित की। · वे साहित्यिक और सामाजिक आंदोलनों से गहरे जुड़े रहे हैं। साहित्यिक विशेषताएँ एवं रचना-संसार: 1. काव्य भाषा एवं शिल्प:    · उनकी कविता की भाषा सहज, तर्कसंगत और अत्यंत प्रभावशाली है। वे जटिल...

वीरेन डंगवाल: परिचय

वीरेन डंगवाल: परिचय वीरेन डंगवाल (5 अगस्त, 1947 – 28 सितंबर, 2015) हिंदी के प्रसिद्ध जनपक्षधर कवि, आलोचक एवं अनुवादक थे। उनकी कविताएँ समकालीन सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती हैं तथा आम आदमी के संघर्ष और आक्रोश को मुखर आवाज देती हैं। वे 'दुष्चक्र में स्रष्टा' जैसी चर्चित कविता के रचयिता के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। --- प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा: · जन्म: 5 अगस्त, 1947 को काठगोदाम, नैनीताल (उत्तराखंड) में। · शिक्षा: स्नातक तक की शिक्षा कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल से प्राप्त की। बाद में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली से हिंदी साहित्य में एम.ए. किया। · उनकी रचनात्मकता पर जेएनयू के प्रगतिशील वातावरण और नक्सलबाड़ी आंदोलन का गहरा प्रभाव पड़ा। कार्यक्षेत्र: · उन्होंने दूरदर्शन में नौकरी की और इग्नू (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय) में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया। · वे सक्रिय रूप से प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और साहित्यिक-सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया। साहित्यिक विशेषताएँ एवं रचना-संसार: 1. काव्य भाषा एवं ...

मनोहर श्याम जोशी: जीवन परिचय

मनोहर श्याम जोशी: जीवन परिचय मनोहर श्याम जोशी (९ अगस्त, १९३३ - ३० मार्च, २००६) हिंदी साहित्य और टेलीविजन जगत के एक प्रतिष्ठित स्तंभ थे। वे एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे—उपन्यासकार, पटकथा लेखक, व्यंग्यकार और पत्रकार। --- प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा: · जन्म: ९ अगस्त, १९३३ को अजमेर, राजस्थान (पैतृक निवास: अल्मोड़ा, उत्तराखंड)। · शिक्षा: इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. और पीएच.डी. (हिंदी साहित्य)। उनकी पीएच.डी. का विषय था—"भारतेंदु युगीन नाटक में सामाजिक चेतना"। कार्यक्षेत्र एवं योगदान: 1. साहित्यिक सफर:    · उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 'सारिका' (टाइम्स ऑफ इंडिया समूह) जैसी लोकप्रिय पत्रिका के संपादक के रूप में की।    · उनकी लेखन शैली में गहन व्यंग्य, मार्मिकता और नए प्रयोग की छाप थी।    · प्रमुख उपन्यास:      · 'कुरु कुरु स्वाहा' (१९७८): यह उपन्यास भारतीय मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों, राजनीति और तिकड़मबाजी पर एक करारा व्यंग्य है। यह हिंदी का एक क्लासिक उपन्यास माना जाता है।      · 'कसप' (१९८६): अवधी लोकभाषा में लिखा गया यह उपन्यास...

आत्मकथा का उद्भव और विकास

आत्मकथा का उद्भव और विकास आत्मकथा आधुनिक गद्य साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है, जिसमें लेखक अपने स्वयं के जीवन के अनुभवों, स्मृतियों, विचारों और भावनाओं का कलात्मक व यथार्थपूर्ण वर्णन करता है। यह आत्म-अन्वेषण और आत्म-प्रकाशन की एक साहसिक प्रक्रिया है। --- उद्भव (उत्पत्ति) के स्रोत आत्मकथा के उद्भव के लिए दो प्रमुख स्रोत माने जा सकते हैं: 1. पाश्चात्य प्रभाव:    · पश्चिम में आत्मकथा का आधुनिक रूप पुनर्जागरण के बाद व्यक्ति-केंद्रित दृष्टिकोण के विकास के साथ उभरा।    · फ्रांस के रूसो की 'कन्फेशन्स' (1782) को पश्चिम की पहली आधुनिक आत्मकथा माना जाता है, जिसने आत्म-विश्लेषण और निजी अनुभवों की ईमानदार अभिव्यक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। 2. भारतीय साहित्यिक परंपरा:    · प्राचीन संस्कृत साहित्य में भी आत्मकथात्मक तत्व मिलते हैं, जैसे बाणभट्ट का 'हर्षचरित' (आत्मकथात्मक जीवनचरित), कल्हण की 'राजतरंगिणी'।    · मध्यकालीन साहित्य में संत-भक्त कवियों की वाणी (जैसे- मीराबाई के पद, कबीर के दोहे, तुलसीदास की भक्ति) में उनके व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभवों की अभिव्यक्ति...

नाटक का उद्भव और विकास

नाटक का उद्भव और विकास नाटक मंचन की कला के साथ संबद्ध साहित्य की प्रमुख विधा है, जिसमें संवाद, अभिनय, निर्देशन, मंच-सज्जा आदि तत्वों के माध्यम से कथा या विचार का प्रस्तुतीकरण होता है। इसका उद्भव और विकास विश्व साहित्य की प्राचीनतम परंपराओं से जुड़ा है। --- नाटक का उद्भव (उत्पत्ति) 1. प्राचीन भारतीय परिप्रेक्ष्य: · भरत मुनि का 'नाट्यशास्त्र' (लगभग 200 ई.पू. - 200 ई.): भारत में नाटक का सैद्धांतिक आधार 'नाट्यशास्त्र' से प्राप्त होता है। इसे 'पंचम वेद' की संज्ञा दी गई है। · उत्पत्ति का दिव्य सिद्धांत: भरत मुनि के अनुसार, देवताओं की प्रार्थना पर ब्रह्मा ने चारों वेदों से सार लेकर 'नाट्यवेद' की रचना की, जिसका उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा देना था। · लोक परंपराएँ: लोक-नाट्य, नृत्य-नाटिकाएँ, धार्मिक अनुष्ठान और लोककथाओं का अभिनय भी नाटक के जन्म का आधार रहा। 2. पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य: · प्राचीन यूनान (5वीं शताब्दी ई.पू.): पश्चिम में नाटक का जन्म यूनान के डायोनिसस (देवता) के उत्सवों में होने वाले गायन और नृत्य से हुआ। इन उत्सवों से ट्रेजेडी (शोकांत नाटक) और क...

उपन्यास का उद्भव और विकास

उपन्यास का उद्भव और विकास उपन्यास आधुनिक गद्य साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय और जटिल विधा है। यह एक काल्पनिक कथा के माध्यम से जीवन और समाज के यथार्थ का व्यापक एवं गहन चित्रण प्रस्तुत करता है। इसका उदय और विकास एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। --- उद्भव (उत्पत्ति) के स्रोत उपन्यास का आधुनिक रूप मुख्यतः पश्चिमी साहित्य (विशेषकर अंग्रेजी और फ्रेंच) से प्रभावित है, लेकिन भारत में इसकी जड़ें प्राचीन एवं मध्यकालीन साहित्यिक परंपराओं में भी देखी जा सकती हैं: 1. पश्चिमी प्रभाव: 19वीं सदी में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के साथ यूरोपीय उपन्यासकारों (जैसे- वाल्टर स्कॉट, चार्ल्स डिकेंस) से प्रेरणा मिली। 2. संस्कृत साहित्यिक परंपरा: कथासाहित्य की समृद्ध परंपरा, जैसे- बाणभट्ट का 'कादम्बरी' (गद्य-काव्य), दंडी का 'दशकुमारचरित', बृहत्कथा आदि को आधुनिक उपन्यास का पूर्वरूप माना जा सकता है। 3. भारतीय लोककथाएँ एवं मौखिक परंपरा: दीर्घकालिक एवं प्रभावशाली कथा-रूढ़ियाँ। 4. मध्यकालीन प्रेमाख्यानक काव्य एवं सूफी रचनाएँ: जैसे 'पद्मावत' आदि में चरित्र-चित्रण और कथानक का विकास दिखता है। हिंदी उपन्यास ...

आदिवासी विमर्श: एक स्पष्टीकरण

आदिवासी विमर्श: एक स्पष्टीकरण आदिवासी विमर्श एक बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना का आंदोलन है, जो भारत के आदिवासी/जनजातीय समुदायों के ऐतिहासिक अनुभव, सांस्कृतिक अस्मिता, अधिकारों के संघर्ष और पारिस्थितिक ज्ञान को केंद्र में रखता है। यह विमर्श उनकी 'विधिवत विस्थापन की नियति' को चुनौती देता है और उनके स्वायत्तता के दावे को सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है। --- आदिवासी विमर्श की प्रमुख विशेषताएँ एवं आयाम: 1. मूल अवधारणा:    · 'आदिवासी' बनाम 'जनजाति': यह विमर्श 'वनवासी', 'अनुसूचित जनजाति' जैसे प्रशासनिक पदबंधों से आगे बढ़कर 'मूल निवासी' होने के गौरव और ऐतिहासिक दावे पर जोर देता है। यह उनकी भूमि, जंगल और प्रकृति के साथ सहजीवन की अवधारणा से जुड़ा है।    · स्वशासन पर बल: यह माँग करता है कि आदिवासी समुदायों को उनकी परंपरागत संस्थाओं (जैसे- मुंडा, भील, संथाल व्यवस्था) के माध्यम से स्वशासन और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण का अधिकार हो। 2. ऐतिहासिक संदर्भ:    · पूर्व-औपनिवेशिक स्वायत्तता: सैकड़ों वर्षों तक आदिवासी समुदायों ने अपनी विशिष्ट सामाजिक-आ...

स्त्रीवादी विमर्श (नारीवादी विमर्श): एक स्पष्टीकरण

स्त्रीवादी विमर्श (नारीवादी विमर्श): एक स्पष्टीकरण स्त्रीवादी विमर्श एक बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन तथा चिंतन की परंपरा है, जिसका केंद्रीय लक्ष्य लैंगिक समानता की स्थापना करना और पितृसत्तात्मक व्यवस्था का विश्लेषण व विखंडन करना है। यह महिलाओं के अनुभवों, अधिकारों, हितों और संघर्षों को समझने, व्यक्त करने और उनके लिए न्याय व स्वायत्तता प्राप्त करने का प्रयास है। --- स्त्रीवादी विमर्श की प्रमुख विशेषताएँ एवं आयाम: 1. मूल अवधारणा एवं उद्देश्य:    · लैंगिक समानता: यह विचार कि महिला और पुरुष सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और कानूनी सभी क्षेत्रों में समान अधिकार और अवसर के हकदार हैं।    · पितृसत्ता का विश्लेषण: उस सामाजिक व्यवस्था की आलोचना जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर प्रभुत्व और नियंत्रण होता है, और जो लैंगिक भूमिकाओं को जैविक नहीं बल्कि सामाजिक रूप से निर्मित मानती है।    · निजी है राजनीतिक: यह मूलमंत्र इस बात पर जोर देता है कि घर के भीतर की असमानताएँ (जैसे- गृहकार्य का बँटवारा, हिंसा, यौनिकता) भी राजनीतिक मुद्दे हैं और सार्वजनिक विमर्श व नीति का हिस्सा होनी...

दलित विमर्श: एक स्पष्टीकरण

दलित विमर्श: एक स्पष्टीकरण दलित विमर्श एक बौद्धिक, सामाजिक और साहित्यिक आंदोलन है, जिसका मूल उद्देश्य भारतीय समाज में सदियों से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से उत्पीड़ित दलित समुदाय के अनुभवों, संघर्षों, अधिकारों और अस्मिता को केंद्र में लाना है। यह एक प्रतिरोध का विमर्श है, जो वर्चस्वशाली सामाजिक-सांस्कृतिक ढाँचे और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के मूल्यों को चुनौती देता है। --- दलित विमर्श की प्रमुख विशेषताएँ एवं आयाम: 1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:    · यह हजारों सालों से चली आ रही जाति-आधारित असमानता, छुआछूत, शोषण और बहिष्कार के विरुद्ध एक आवाज है।    · इसकी जड़ें 19वीं-20वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों (जैसे- ज्योतिबा फुले, शाहूजी महाराज का योगदान) और डॉ. भीमराव अम्बेडकर के चिंतन एवं संघर्ष में निहित हैं। अम्बेडकर दलित विमर्श के प्रमुख प्रवर्तक और प्रेरणास्रोत माने जाते हैं। 2. मुख्य उद्देश्य:    · अस्मिता की खोज: दलित समुदाय की एक गौरवपूर्ण और स्वायत्त पहचान का निर्माण करना, जो पारंपरिक रूप से थोपे गए "हीन" बोध से मुक्त हो।    · स्व...

"लल्लु कब लौटेगी" -बनारसीदास चतुर्वेदी जी

 "लल्लु कब  लौटेगी" -बनारसीदास चतुर्वेदी जी  यह प्रश्न बनारसीदास चतुर्वेदी जी के एक प्रसिद्ध रेखाचित्र का शीर्षक है। यह एक साहित्यिक रचना है, जिसमें लेखक ने 'लल्लू' नामक एक स्त्री पात्र के माध्यम से सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं को चित्रित किया है। अतः "लल्लू कब लौटेगी" का तात्पर्य किसी वास्तविक व्यक्ति से नहीं, बल्कि इस रेखाचित्र के कथानक और उसकी संवेदनात्मक उत्कंठा से है। --- दूसरा भाग: बनारसीदास चतुर्वेदी के रेखाचित्र की विशेषताएँ बनारसीदास चतुर्वेदी (१८९२-१९८५) हिंदी गद्य साहित्य, विशेषकर रेखाचित्र विधा के एक प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उनके रेखाचित्रों की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं: 1. सहज, मार्मिक एवं संवेदनशील शैली: चतुर्वेदी जी की भाषा सरल, व्यावहारिक और हृदयस्पर्शी है। वे पाठक को सीधे उसके भावबोध से जोड़ लेते हैं। "लल्लू कब लौटेगी" इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ एक साधारण प्रश्न के माध्यम से गहन वेदना और प्रतीक्षा की पीड़ा व्यक्त होती है। 2. सामाजिक यथार्थ का चित्रण: उनके रेखाचित्र समाज के साधारण, उपेक्षित और मध्यमवर्गीय जीवन की...