नाटक का उद्भव और विकास

नाटक का उद्भव और विकास

नाटक मंचन की कला के साथ संबद्ध साहित्य की प्रमुख विधा है, जिसमें संवाद, अभिनय, निर्देशन, मंच-सज्जा आदि तत्वों के माध्यम से कथा या विचार का प्रस्तुतीकरण होता है। इसका उद्भव और विकास विश्व साहित्य की प्राचीनतम परंपराओं से जुड़ा है।

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नाटक का उद्भव (उत्पत्ति)

1. प्राचीन भारतीय परिप्रेक्ष्य:

· भरत मुनि का 'नाट्यशास्त्र' (लगभग 200 ई.पू. - 200 ई.): भारत में नाटक का सैद्धांतिक आधार 'नाट्यशास्त्र' से प्राप्त होता है। इसे 'पंचम वेद' की संज्ञा दी गई है।
· उत्पत्ति का दिव्य सिद्धांत: भरत मुनि के अनुसार, देवताओं की प्रार्थना पर ब्रह्मा ने चारों वेदों से सार लेकर 'नाट्यवेद' की रचना की, जिसका उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा देना था।
· लोक परंपराएँ: लोक-नाट्य, नृत्य-नाटिकाएँ, धार्मिक अनुष्ठान और लोककथाओं का अभिनय भी नाटक के जन्म का आधार रहा।

2. पाश्चात्य परिप्रेक्ष्य:

· प्राचीन यूनान (5वीं शताब्दी ई.पू.): पश्चिम में नाटक का जन्म यूनान के डायोनिसस (देवता) के उत्सवों में होने वाले गायन और नृत्य से हुआ। इन उत्सवों से ट्रेजेडी (शोकांत नाटक) और कॉमेडी (सुखांत नाटक) का विकास हुआ।
· प्रमुख यूनानी नाटककार: एस्किलस, सोफोक्लीज, यूरिपिडीज (शोकांत); एरिस्टोफेन्स (हास्य)।
· रोमन नाटक: प्लॉटस, टेरेन्स।

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हिंदी नाटक का ऐतिहासिक विकास

हिंदी नाटक का विकास मुख्यतः 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से माना जाता है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में संस्कृत और भाषा नाटकों की परंपरा रही है।

1. पूर्व-भारतेन्दु काल (1868 से पहले):

· संस्कृत नाटकों के अनुवाद और रूपांतर प्रमुख थे।
· 'नहुष' (1857): गोपालचंद्र गोविंद ने लिखा, जिसे प्रथम हिंदी नाटक माना जाता है।
· इस दौरान मुख्यतः भाषा (ब्रज, अवधी) में रचे गए नाटक मिलते हैं।

2. भारतेन्दु युग (1868-1900):

· हिंदी नाटक के जनक भारतेन्दु हरिश्चंद्र हैं। उन्होंने नाटक को सामाजिक चेतना और राष्ट्रप्रेम का माध्यम बनाया।
· विषय-वस्तु: सामाजिक कुरीतियाँ (अंधविश्वास, नारी शिक्षा), ऐतिहासिक गौरव, राजनीतिक चेतना।
· शैली: हास्य-व्यंग्य, संवादात्मक प्रवाह।
· प्रमुख नाटक: 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति', 'भारत दुर्दशा', 'नीलदेवी', 'अंधेर नगरी' (यह व्यंग्य आज भी प्रासंगिक है)।
· अन्य लेखक: राधाचरण गोस्वामी, बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'।

3. द्विवेदी युग या पूर्व-प्रसाद युग (1900-1918):

· भारतेन्दु की परंपरा का विकास, लेकिन अधिक आदर्शवाद और नैतिक शिक्षा पर बल।
· प्रमुख नाटककार: जयशंकर प्रसाद का प्रारंभिक नाटक 'चन्द्रगुप्त' (1905) इसी काल में आता है। सेठ गोविन्ददास, लक्ष्मीनारायण मिश्र।

4. प्रसाद युग (1918-1937):

· हिंदी नाटक का स्वर्ण युग। जयशंकर प्रसाद ने हिंदी नाटक को काव्यात्मक गरिमा, दार्शनिक गहराई और ऐतिहासिक चेतना प्रदान की।
· शोकांत नाटकों की परंपरा: प्रसाद ने मुख्यतः शोकांत नाटक लिखे, जिनमें मानवीय भावनाओं और दार्शनिक तत्वों का समन्वय है।
· प्रमुख नाटक: 'स्कंदगुप्त', 'चन्द्रगुप्त', 'ध्रुवस्वामिनी' और महान रचना 'अजातशत्रु'।
· इस युग में रामकुमार वर्मा ने भी ऐतिहासिक नाटकों ('चंद्रहास', 'प्रतिहारि विरुद्ध') से योगदान दिया।

5. प्रसादोत्तर युग / प्रयोगवादी युग (1937-1960):

· प्रसाद की काव्यात्मक शैली से अलग हटकर यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिकता और प्रयोग पर बल।
· सामाजिक यथार्थवादी नाटक: उपेन्द्रनाथ अश्क ('अंजो दीदी', 'पैंसठ लाख')।
· प्रगतिवादी नाटक: भुवनेश्वर ('तमाशा'), हरिकृष्ण प्रेमी।
· एकांकी नाटक का विकास: विशेष रूप से लोकप्रिय हुए। रामकुमार वर्मा, विष्णु प्रभाकर, जगदीशचन्द्र माथुर ('कोणार्क')।

6. समकालीन/नवनाट्य युग (1960 के बाद):

· यह रूप और विषय दोनों स्तरों पर क्रांति का दौर है। पश्चिमी नाट्य-विचारकों (ब्रेख्त, बेकेट) का प्रभाव।
· प्रयोगधर्मिता: पारंपरिक कथानक और संरचना से मुक्ति।
· प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं नाटककार:
  · प्रतीकात्मक एवं अस्तित्ववादी नाटक: मोहन राकेश ('आषाढ़ का एक दिन', 'लेहरें', 'आधे-अधूरे')। इन्होंने हिंदी नाटक को नयी दिशा दी।
  · जनवादी एवं विचारधारात्मक नाटक: हबीब तनवीर (नुक्कड़ नाटक, 'चरणदास चोर')।
  · प्रयोगवादी एवं अभिनव नाट्य: विजय तेंदुलकर (मराठी, पर हिंदी में प्रभावशाली - 'शांतता! कोर्ट चालू आहे'), सत्यदेव दुबे, दिलीप कुमार, मुद्राराक्षस।
  · ऐतिहासिक पुनर्व्याख्या के नाटक: गिरीश कर्नाड (कन्नड़), मणि मधुकर।
  · विमर्शों के नाटक: दलित, स्त्रीवादी, आदिवासी पहचान पर केंद्रित रचनाएँ।

हिंदी नाटक के विकास की प्रमुख प्रवृत्तियाँ - सारांश

काल प्रमुख प्रवृत्ति विषय-वस्तु प्रमुख नाटककार एवं रचनाएँ
भारतेन्दु युग (1868-1900) सामाजिक-राजनीतिक जागरण, व्यंग्य सामाजिक कुरीतियाँ, राष्ट्रप्रेम भारतेन्दु हरिश्चंद्र ('अंधेर नगरी')
प्रसाद युग (1918-1937) काव्यात्मक शोकांत, ऐतिहासिकता ऐतिहासिक गौरव, दार्शनिकता जयशंकर प्रसाद ('अजातशत्रु', 'ध्रुवस्वामिनी')
प्रसादोत्तर युग (1937-1960) यथार्थवाद, एकांकी का विकास सामाजिक समस्याएँ, मनोविज्ञान उपेन्द्रनाथ अश्क, रामकुमार वर्मा
नवनाट्य युग (1960-आज तक) प्रयोगवाद, प्रतीकात्मकता, विमर्श अस्तित्ववाद, राजनीति, पहचान मोहन राकेश ('आषाढ़ का एक दिन'), हबीब तनवीर, विजय तेंदुलकर

निष्कर्ष:

हिंदी नाटक का विकास भारतेन्दु के सामाजिक व्यंग्य से शुरू होकर प्रसाद की काव्यात्मक गरिमा से गुजरता हुआ, मोहन राकेश के अस्तित्ववाद और हबीब तनवीर के जनवादी रंगमंच तक पहुँचा है। आज यह बहुविषयक, बहुरूपी और अत्यंत प्रयोगधर्मी विधा है, जो रंगमंच और दृश्य-श्रव्य माध्यमों के नए तकनीकी प्रयोगों को भी आत्मसात कर रहा है। नाटक की यह यात्रा साहित्य और कला के माध्यम से समाज के सतत संवाद का प्रमाण है।

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