"लल्लु कब लौटेगी" -बनारसीदास चतुर्वेदी जी
"लल्लु कब लौटेगी" -बनारसीदास चतुर्वेदी जी
यह प्रश्न बनारसीदास चतुर्वेदी जी के एक प्रसिद्ध रेखाचित्र का शीर्षक है। यह एक साहित्यिक रचना है, जिसमें लेखक ने 'लल्लू' नामक एक स्त्री पात्र के माध्यम से सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं को चित्रित किया है। अतः "लल्लू कब लौटेगी" का तात्पर्य किसी वास्तविक व्यक्ति से नहीं, बल्कि इस रेखाचित्र के कथानक और उसकी संवेदनात्मक उत्कंठा से है।
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दूसरा भाग: बनारसीदास चतुर्वेदी के रेखाचित्र की विशेषताएँ
बनारसीदास चतुर्वेदी (१८९२-१९८५) हिंदी गद्य साहित्य, विशेषकर रेखाचित्र विधा के एक प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उनके रेखाचित्रों की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
1. सहज, मार्मिक एवं संवेदनशील शैली: चतुर्वेदी जी की भाषा सरल, व्यावहारिक और हृदयस्पर्शी है। वे पाठक को सीधे उसके भावबोध से जोड़ लेते हैं। "लल्लू कब लौटेगी" इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ एक साधारण प्रश्न के माध्यम से गहन वेदना और प्रतीक्षा की पीड़ा व्यक्त होती है।
2. सामाजिक यथार्थ का चित्रण: उनके रेखाचित्र समाज के साधारण, उपेक्षित और मध्यमवर्गीय जीवन की सच्चाइयों को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत करते हैं। उनमें आडंबर या अतिशयोक्ति नहीं होती।
3. मानवीय संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण: चतुर्वेदी जी पारिवारिक और सामाजिक संबंधों की बारीकियों, उनमें आने वाले तनावों, विश्वासघात और निष्ठा को बहुत ही कुशलता से उकेरते हैं। उनके पात्र अक्सर सामान्य जीवन के संघर्षों से जूझते हुए दिखाई देते हैं।
4. लघु आकार में गहरा प्रभाव: रेखाचित्र संक्षिप्त विधा है, पर चतुर्वेदी जी कम शब्दों में ही किसी चरित्र, स्थिति या दृश्य का इतना सजीव और पूर्ण चित्र खींच देते हैं कि वह पाठक के मन पर लंबे समय तक अंकित रह जाता है।
5. चरित्र-चित्रण की कुशलता: उनके रेखाचित्रों में पात्रों का चित्रण इतना सटीक और जीवंत होता है कि वे हमारे अपने आस-पास के जाने-पहचाने लोग लगने लगते हैं। लल्लू का पात्र भी इसी श्रेणी में आता है।
6. आत्मीयता और सहानुभूति का भाव: लेखक का दृष्टिकोण अपने पात्रों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण और आत्मीय है। वह उनके दुःख-सुख में शामिल होकर, पाठक को भी उसमें भागीदार बना लेता है।
7. गहन दार्शनिकता एवं जीवन-मूल्य: सतही चित्रण से आगे बढ़कर उनके रेखाचित्र जीवन के गहन सत्यों, मानवीय मूल्यों और नैतिक प्रश्नों को भी छूते हैं।
संक्षेप में: बनारसीदास चतुर्वेदी के रेखाचित्र हिंदी की मूल्यवान साहित्यिक निधि हैं। वे सामान्य में असामान्य और स्थूल में सूक्ष्म को खोजकर, एक ऐसा यथार्थ चित्र प्रस्तुत करते हैं जो पाठक को भावनात्मक स्तर पर झकझोर देता है और सामाजिक सोच के लिए प्रेरित करता है। "लल्लू कब लौटेगी" उनकी इसी कलात्मक प्रतिभा का एक जीवंत उदाहरण है।
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