आदिवासी विमर्श: एक स्पष्टीकरण

आदिवासी विमर्श: एक स्पष्टीकरण

आदिवासी विमर्श एक बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना का आंदोलन है, जो भारत के आदिवासी/जनजातीय समुदायों के ऐतिहासिक अनुभव, सांस्कृतिक अस्मिता, अधिकारों के संघर्ष और पारिस्थितिक ज्ञान को केंद्र में रखता है। यह विमर्श उनकी 'विधिवत विस्थापन की नियति' को चुनौती देता है और उनके स्वायत्तता के दावे को सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है।

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आदिवासी विमर्श की प्रमुख विशेषताएँ एवं आयाम:

1. मूल अवधारणा:
   · 'आदिवासी' बनाम 'जनजाति': यह विमर्श 'वनवासी', 'अनुसूचित जनजाति' जैसे प्रशासनिक पदबंधों से आगे बढ़कर 'मूल निवासी' होने के गौरव और ऐतिहासिक दावे पर जोर देता है। यह उनकी भूमि, जंगल और प्रकृति के साथ सहजीवन की अवधारणा से जुड़ा है।
   · स्वशासन पर बल: यह माँग करता है कि आदिवासी समुदायों को उनकी परंपरागत संस्थाओं (जैसे- मुंडा, भील, संथाल व्यवस्था) के माध्यम से स्वशासन और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण का अधिकार हो।
2. ऐतिहासिक संदर्भ:
   · पूर्व-औपनिवेशिक स्वायत्तता: सैकड़ों वर्षों तक आदिवासी समुदायों ने अपनी विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में स्वायत्त जीवन जिया।
   · औपनिवेशिक विस्थापन का दौर: अंग्रेजों के 'राजस्व बंदोबस्त' और 'वन अधिनियम' (1865, 1878) ने उनकी सामूहिक भूमि-अधिकार की व्यवस्था को नष्ट किया, जिससे बड़े पैमाने पर विद्रोह हुए (जैसे- संथाल हूल (1855), बिरसा मुंडा का उलगुलान (1899-1900))।
   · स्वतंत्र भारत में उपेक्षा और संघर्ष: विकास के नाम पर बड़े बाँध, खदानें और उद्योग लगाने के लिए आदिवासियों का व्यापक विस्थापन हुआ, जिसने नए संघर्षों को जन्म दिया (नर्मदा बचाओ आंदोलन, छत्तीसगढ़ का संघर्ष)।
3. विमर्श के प्रमुख सरोकार:
   · भूमि एवं जल-जंगल-जमीन का अधिकार: यह विमर्श का सबसे केंद्रीय मुद्दा है। आदिवासी अर्थव्यवस्था और संस्कृति प्रकृति और भूमि पर टिकी है। पेसा अधिनियम (1996) और वन अधिकार अधिनियम (2006) इसी संघर्ष की उपज हैं।
   · सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा: भाषा, रीति-रिवाज, धर्म (प्रकृति पूजा), कला और सामूहिक जीवनशैली को बचाने और विकसित करने का प्रयास।
   · विस्थापन और पुनर्वास: विकास परियोजनाओं में 'सहमति' और 'न्यायपूर्ण पुनर्वास' की माँग।
   · औपनिवेशिक कानूनों की आलोचना: वन कानून और भू-अर्जन कानूनों की समीक्षा की माँग।
   · स्वायत्त क्षेत्रों का दावा: संविधान की पाँचवीं और छठी अनुसूची के तहत प्रदत्त अधिकारों के पूर्ण क्रियान्वयन की लड़ाई।
4. साहित्य एवं संस्कृति में अभिव्यक्ति:
   · मौखिक परंपरा का दस्तावेजीकरण: लोकगीत, कथाएँ, महाकाव्य जो प्रकृति और संघर्ष से जुड़े हैं।
   · आदिवासी साहित्य का उदय: आदिवासी लेखकों द्वारा अपनी भाषा और अनुभव को केंद्र में रखकर रचना। यह 'बाहरी' द्वारा लिखे गए 'नृवंशवाचक' चित्रण से अलग है।
   · प्रमुख हस्ताक्षर: रामदयाल मुंडा, निर्मला पुतुल, वाहरु सोनवणे, हरिराम मीणा, जयंत माझी, महाश्वेता देवी (गैर-आदिवासी लेखिका जिन्होंने आदिवासियों के संघर्ष को केंद्र में रखा)।
5. राजनीतिक एवं सामाजिक आंदोलन:
   · झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना जैसे राज्यों के गठन के पीछे आदिवासी अस्मिता और विकास के मुद्दे प्रमुख थे।
   · संथाल परगना, उत्तर-पूर्व के राज्यों में स्वायत्तता के आंदोलन।
   · झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे राजनीतिक दलों का उदय।
6. विशिष्टता एवं अन्य विमर्शों से अंतर:
   · दलित विमर्श से: दलित विमर्श जाति-आधारित छुआछूत और वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध है, जबकि आदिवासी विमर्श का संघर्ष स्वायत्तता, भूमि अधिकार और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। आदिवासी अक्सर स्वयं को वर्ण व्यवस्था से बाहर मानते हैं।
   · स्त्रीवादी विमर्श से: आदिवासी समाज में स्त्री-पुरुष संबंध अक्सर अलग होते हैं, हालाँकि 'आदिवासी नारीवाद' सामुदायिक अधिकारों और लैंगिक न्याय को साथ लेकर चलता है।

निष्कर्ष:

आदिवासी विमर्श केवल एक साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि भूमि, स्वायत्तता और अस्मिता के लिए एक सतत सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष है। यह भारत के 'विकास' के मॉडल और राष्ट्र-राज्य की अवधारणा पर गहरा सवाल खड़ा करता है। यह विमर्श इस बात की ओर संकेत करता है कि भारत की सही लोकतांत्रिक और बहुलवादी प्रकृति तभी साकार हो सकती है, जब आदिवासी समुदायों को न केवल संरक्षण बल्कि सम्मान और स्वशासन का अधिकार प्राप्त हो। यह पारिस्थितिक संतुलन और सामूहिक जीवन के वैकल्पिक मॉडल की ओर भी इशारा करता है।

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