दलित विमर्श: एक स्पष्टीकरण
दलित विमर्श: एक स्पष्टीकरण
दलित विमर्श एक बौद्धिक, सामाजिक और साहित्यिक आंदोलन है, जिसका मूल उद्देश्य भारतीय समाज में सदियों से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से उत्पीड़ित दलित समुदाय के अनुभवों, संघर्षों, अधिकारों और अस्मिता को केंद्र में लाना है। यह एक प्रतिरोध का विमर्श है, जो वर्चस्वशाली सामाजिक-सांस्कृतिक ढाँचे और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के मूल्यों को चुनौती देता है।
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दलित विमर्श की प्रमुख विशेषताएँ एवं आयाम:
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
· यह हजारों सालों से चली आ रही जाति-आधारित असमानता, छुआछूत, शोषण और बहिष्कार के विरुद्ध एक आवाज है।
· इसकी जड़ें 19वीं-20वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों (जैसे- ज्योतिबा फुले, शाहूजी महाराज का योगदान) और डॉ. भीमराव अम्बेडकर के चिंतन एवं संघर्ष में निहित हैं। अम्बेडकर दलित विमर्श के प्रमुख प्रवर्तक और प्रेरणास्रोत माने जाते हैं।
2. मुख्य उद्देश्य:
· अस्मिता की खोज: दलित समुदाय की एक गौरवपूर्ण और स्वायत्त पहचान का निर्माण करना, जो पारंपरिक रूप से थोपे गए "हीन" बोध से मुक्त हो।
· स्वाधीनता और मानवाधिकार: मनुष्य के रूप में सम्मान, समानता, शिक्षा, भूमि और राजनीतिक भागीदारी के अधिकारों की माँग।
· ब्राह्मणवादी व्यवस्था का विखंडन: वर्ण-व्यवस्था और उसके पोषक धार्मिक ग्रंथों व रीति-रिवाजों की मूलभूत आलोचना करना।
· इतिहास का पुनर्लेखन: इतिहास को दलित दृष्टिकोण से देखना और उन नायकों व योगदानों को सामने लाना जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास से हटा दिया गया था।
3. साहित्य में दलित विमर्श:
· दलित विमर्श का सबसे प्रभावशाली रूप दलित साहित्य के माध्यम से सामने आया। यह "अनुभव की प्रामाणिकता" पर जोर देता है।
· इसकी मुख्य विधाएँ हैं: आत्मकथा, कविता, कहानी, उपन्यास और निबंध।
· भाषा शैली: यह संस्कृतनिष्ठ, अलंकारिक भाषा को त्यागकर जनसामान्य की बोलचाल की भाषा, कठोर यथार्थ और कई बार आक्रोशपूर्ण अभिव्यक्ति का प्रयोग करता है।
· प्रमुख साहित्यकार: मराठी में बाबा साहेब अम्बेडकर, नामदेव ढसाल, दया पवार; हिंदी में ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जूही, कंवल भारती, माता प्रसाद; तमिल में बामा, सुकीरथरिणी; कन्नड़ में देवनूर महादेव आदि।
4. राजनीतिक एवं सामाजिक आयाम:
· दलित विमर्श ने दलितों के लिए आरक्षण, भूमि सुधार और कानूनी अधिकारों की माँग को मजबूती दी।
· इसने दलित राजनीति के उदय और सत्ता में भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया।
· यह अन्य वंचित समूहों (जैसे आदिवासी, महिला, अल्पसंख्यक विमर्श) के साथ एकता और गठजोड़ की भी बात करता है।
5. आलोचना एवं चुनौतियाँ:
· कभी-कभी इसे "विभाजनकारी" कहकर आलोचना की जाती है।
· दलित समुदाय के भीतर ही जातिगत पदानुक्रम और गैर-बराबरी की चुनौती बनी हुई है।
· दलित साहित्य को कई बार "केवल क्रोध" तक सीमित मान लिया जाता है, जबकि इसकी भाव-संवेदनाएँ बहुत व्यापक हैं।
निष्कर्ष:
दलित विमर्श केवल एक साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक व्यापक सांस्कृतिक-बौद्धिक संघर्ष है। यह भारतीय समाज के समक्ष एक दर्पण रखता है और उसे एक समतामूलक, समावेशी और उत्पीड़न-रहित समाज की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित एवं चुनौती देता है। यह एक नए, अधिक न्यायपूर्ण इतिहास और समाज के निर्माण का आह्वान है।
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