लल्लु कब लौटेगी' (बनारसीदास चतुर्वेदी) रेखाचित्र की समीक्षा

'लल्लु कब लौटेगी' (बनारसीदास चतुर्वेदी) रेखाचित्र की समीक्षा

बनारसीदास चतुर्वेदी (१८९२-१९८५) हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार, सम्पादक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका रेखाचित्र 'लल्लु कब लौटेगी' एक मार्मिक, सामाजिक यथार्थवादी और मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत रचना है।

1. विषय-वस्तु एवं कथानक:

· यह रेखाचित्र एक गरीब, साधनहीन परिवार की बालिका लल्लु के इर्द-गिर्द घूमता है, जो अपने परिवार की आर्थिक मदद के लिए बचपन में ही पड़ोस के एक संपन्न घर में नौकरानी बन जाती है।
· कथानक लल्लु के बचपन के शोषण, उसकी मासूम इच्छाओं, और उसकी विवशताओं को चित्रित करता है। लेखक की दृष्टि में लल्लु कोई नौकरानी नहीं, बल्कि एक बच्ची है जिसका बचपन छीन लिया गया है।
· केंद्रीय प्रश्न "लल्लु कब लौटेगी?" उसकी मुक्ति की आकांक्षा और उसके परिवार की बेबसी को व्यक्त करता है।

2. शिल्पगत विशेषताएँ:

· रेखाचित्र का स्वरूप: चतुर्वेदी जी ने रेखाचित्र की संक्षिप्तता, प्रभावशीलता और मनोवैज्ञानिक गहराई का सुंदर उपयोग किया है। थोड़े में ही पूरा चरित्र और सामाजिक परिदृश्य उभर आता है।
· भाषा-शैली: सरल, सहज, संवादात्मक हिंदी जिसमें आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग है। भावनात्मक उत्तेजना के बिना ही करुणा का स्वर मुखरित हुआ है।
· चरित्र-चित्रण: लल्लु का चरित्र बड़ी सूक्ष्मता से उकेरा गया है — उसकी मासूमियत, छोटी-छोटी खुशियाँ, डर, और कर्तव्यनिष्ठा। उसके माता-पिता की विवशता भी प्रभावी है।
· प्रतीकात्मकता: लल्लु शोषित वर्ग की बाल श्रमिक का प्रतीक बन जाती है। उसका नाम पुकारना समाज के एक वर्ग की उपेक्षा को इंगित करता है।

3. सामाजिक-सांस्कृतिक समीक्षा:

· शोषण की पृष्ठभूमि: रेखाचित्र गरीबी, बाल श्रम, सामाजिक विषमता और वर्ग भेद पर प्रहार करता है। लल्लु के माध्यम से उस युग की सामाजिक व्यवस्था की कठोर सच्चाई उजागर होती है।
· नारी जीवन की विडंबना: एक बालिका के रूप में लल्लु का शोषण स्त्री जीवन की शुरुआती पीड़ा को दर्शाता है।
· मानवीय संवेदना: लेखक का दृष्टिकोण उपकारी या दयावान नहीं, बल्कि सहानुभूतिपूर्ण और समतामूलक है। वह लल्लु को "नौकरानी" की बजाय एक "बच्ची" के रूप में देखता है।

4. वैश्विक संदर्भ:

· यह रेखाचित्र चार्ल्स डिकेंस के उपन्यासों की याद दिलाता है, जहाँ बाल पात्र सामाजिक यथार्थ के केंद्र में होते हैं।
· भारतीय सामाजिक संरचना की झलक: गाँव-शहर का अंतर, गरीब-अमीर का संबंध, और नौकर-मालिक का रिश्ता स्पष्ट है।

5. कमियाँ या आलोचनात्मक दृष्टि:

· कुछ आलोचक मानते हैं कि यह रेखाचित्र अतिरेकी भावुकता से बचते हुए भी एक सीमित दायरे में ही रह जाता है। समाधान की ओर इशारा नहीं करता।
· चरित्रों का विकास स्थिर है — लल्लु की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता, जो शायद यथार्थवाद की मांग भी है।

6. साहित्यिक महत्त्व:

· हिंदी रेखाचित्र विधा को समृद्ध करने वाली एक क्लासिक रचना।
· मानवतावादी दृष्टिकोण का उत्कृष्ट उदाहरण।
· सामाजिक यथार्थवाद की सशक्त अभिव्यक्ति।

निष्कर्ष:

'लल्लु कब लौटेगी' एक सामाजिक दस्तावेज़ की तरह है, जो बाल मजदूरी और गरीबी की मार झेलते एक वर्ग की पीड़ा को अमर कर देता है। बनारसीदास चतुर्वेदी ने सहज, संवेदनशील भाषा में जिस मानवीय करुणा को व्यक्त किया है, वह आज भी प्रासंगिक है। यह रेखाचित्र पाठक के मन में लल्लु के प्रति सहानुभूति ही नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के प्रति प्रतिरोध का भाव भी जगाता है। इसकी सादगी में ही इसकी शक्ति निहित है।

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