उपन्यास का उद्भव और विकास
उपन्यास का उद्भव और विकास
उपन्यास आधुनिक गद्य साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय और जटिल विधा है। यह एक काल्पनिक कथा के माध्यम से जीवन और समाज के यथार्थ का व्यापक एवं गहन चित्रण प्रस्तुत करता है। इसका उदय और विकास एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है।
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उद्भव (उत्पत्ति) के स्रोत
उपन्यास का आधुनिक रूप मुख्यतः पश्चिमी साहित्य (विशेषकर अंग्रेजी और फ्रेंच) से प्रभावित है, लेकिन भारत में इसकी जड़ें प्राचीन एवं मध्यकालीन साहित्यिक परंपराओं में भी देखी जा सकती हैं:
1. पश्चिमी प्रभाव: 19वीं सदी में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के साथ यूरोपीय उपन्यासकारों (जैसे- वाल्टर स्कॉट, चार्ल्स डिकेंस) से प्रेरणा मिली।
2. संस्कृत साहित्यिक परंपरा: कथासाहित्य की समृद्ध परंपरा, जैसे- बाणभट्ट का 'कादम्बरी' (गद्य-काव्य), दंडी का 'दशकुमारचरित', बृहत्कथा आदि को आधुनिक उपन्यास का पूर्वरूप माना जा सकता है।
3. भारतीय लोककथाएँ एवं मौखिक परंपरा: दीर्घकालिक एवं प्रभावशाली कथा-रूढ़ियाँ।
4. मध्यकालीन प्रेमाख्यानक काव्य एवं सूफी रचनाएँ: जैसे 'पद्मावत' आदि में चरित्र-चित्रण और कथानक का विकास दिखता है।
हिंदी उपन्यास का ऐतिहासिक विकास
1. प्रारंभिक या आरंभिक काल (1868 ई. से 1900 ई. तक)
· इस काल के उपन्यासों में सामाजिक एवं ऐतिहासिक विषयवस्तु प्रमुख थी।
· प्रथम हिंदी उपन्यास: 'परीक्षा गुरु' (1882) - श्रीनिवास दास द्वारा रचित। यह दिल्ली के एक कुलीन परिवार के कथानक पर आधारित एक सामाजिक उपन्यास था, जो दिखावे और अनैतिकता के खिलाफ चेतावनी देता था।
· ऐतिहासिक उपन्यासों की प्रधानता: किशोरीलाल गोस्वामी को हिंदी का प्रथम सच्चा उपन्यासकार माना जाता है। उन्होंने 'तारा', 'लवंगलता' जैसे ऐतिहासिक उपन्यास लिखे।
· प्रमुख रचनाकार व रचनाएँ: श्रीनिवास दास, किशोरीलाल गोस्वामी, बालकृष्ण भट्ट ('नूतन ब्रह्मचारी'), राधाकृष्ण दास ('निस्सहाय हिन्दू')।
2. भारतेन्दु युगीन प्रभाव एवं विकास (1900-1918)
· भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने स्वयं उपन्यास नहीं लिखा, लेकिन उनके द्वारा प्रवर्तित सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय भावना ने उपन्यासों को प्रभावित किया।
· उपन्यासों में सामाजिक कुरीतियों (बाल विवाह, विधवा-विवाह, दहेज) के विरुद्ध चेतना और राष्ट्रप्रेम के स्वर मुखर हुए।
· प्रमुख रचनाकार: देवकीनंदन खत्री ('चंद्रकांता' और 'चंद्रकांता संतति') - यह तिलिस्म और ऐय्यारी के अपार लोकप्रिय उपन्यास थे, जिन्होंने हिंदी पाठक वर्ग को विस्तार दिया।
3. शुक्ल युग / प्रेमचंद युग (1918-1936)
· यह हिंदी उपन्यास का स्वर्ण युग माना जाता है। प्रेमचंद इस युग के स्तंभ और हिंदी के युगान्तरकारी उपन्यासकार हैं।
· यथार्थवाद का प्रवेश: प्रेमचंद ने किसानों, ग्रामीण जीवन, सामंती शोषण, नारी जीवन और सामाजिक विसंगतियों का मार्मिक यथार्थ चित्रण किया।
· प्रमुख उपन्यास: 'सेवासदन', 'प्रेमाश्रम', 'रंगभूमि', 'गोदान', 'कर्मभूमि'। 'गोदान' हिंदी का एक महाकाव्यात्मक उपन्यास माना जाता है।
· इसी दौरान मनोवैज्ञानिक उपन्यास का भी सूत्रपात हुआ। जैनेन्द्र कुमार ('सुनीता', 'त्यागपत्र') ने मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से चरित्रों का उद्घाटन किया।
· अन्य प्रमुख लेखक: विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक', वृन्दावनलाल वर्मा (ऐतिहासिक उपन्यास)।
4. प्रयोगवाद एवं नवीन प्रवृत्तियों का युग (1936-1960)
· प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा के साथ-साथ नए प्रयोग भी हुए।
· मनोविश्लेषणात्मक धारा का विकास: इलाचंद्र जोशी, देवराज (उपन्यास 'विस्मृति के अंधकार में')।
· ग्रामीण जीवन के यथार्थ चित्रण: फणीश्वरनाथ 'रेणु' ('मैला आंचल') ने 'आंचलिक उपन्यास' की नई परंपरा शुरू की, जो गाँव के जीवन, भाषा और संस्कृति को केंद्र में रखती थी।
· ऐतिहासिक उपन्यासों में नया मोड़: वृन्दावनलाल वर्मा ('झाँसी की रानी'), हजारीप्रसाद द्विवेदी ('बाणभट्ट की आत्मकथा')।
· प्रगतिवादी उपन्यास: यशपाल ('झूठा सच'), नागार्जुन ('बलचनमा', 'रतिनाथ की चाची') ने सामाजिक-राजनीतिक विषयों को उठाया।
5. समकालीन/नवीन युग (1960 के बाद से अब तक)
· यह विविधताओं, प्रयोगों और नई चेतना का युग है।
· नई कहानी का प्रभाव: राजेन्द्र यादव ('शह और मात', 'सारा आकाश'), मन्नू भंडारी ('आपका बंटी'), कमलेश्वर ('कितने पाकिस्तान')।
· अस्तित्ववादी एवं निर्मम यथार्थवाद: मोहन राकेश ('अंधेरे बंद कमरे'), निर्मल वर्मा ('वे दिन')।
· दलित उपन्यास: ओमप्रकाश वाल्मीकि ('जूठन'), सूरजपाल चौहान ('तिरस्कृत')।
· नारीवादी उपन्यास: कृष्णा सोबती ('मित्रो मरजानी', 'जिंदगीनामा'), मृदुला गर्ग ('चितकोबरा'), मैत्रेयी पुष्पा ('अल्मा कबूतरी')।
· ऐतिहासिक एवं पौराणिक पुनर्लेखन: कृष्णा सोबती ('जैनी मेहरबान सिंह'), पंकज बिष्ट ('राग दरबारी' का स्थान अलग है)।
· बहुवचनात्मकता, जटिल संरचना और अंतरालीय विमर्श समकालीन उपन्यास की प्रमुख विशेषताएँ बन गई हैं।
विकास की प्रमुख प्रवृत्तियाँ - सारांश
काल प्रमुख प्रवृत्ति विषय-वस्तु प्रमुख लेखक
आरंभिक (1882-1900) अनुकरण एवं प्रयोग सामाजिक आदर्शवाद, ऐतिहासिक श्रीनिवास दास, किशोरीलाल गोस्वामी
भारतेन्दु प्रभाव (1900-1918) सामाजिक चेतना, रोमांच सामाजिक कुरीतियाँ, तिलिस्म देवकीनंदन खत्री
प्रेमचंद युग (1918-1936) यथार्थवाद का उदय ग्रामीण जीवन, सामाजिक शोषण प्रेमचंद, जैनेन्द्र कुमार
प्रयोगवादी युग (1936-1960) प्रयोग, मनोविश्लेषण, आंचलिकता मनोविज्ञान, ग्रामीण यथार्थ रेणु, इलाचंद्र जोशी, यशपाल
समकालीन युग (1960-आज तक) बहुलवाद, विमर्श, नवीनता नारी, दलित, इतिहास, अस्तित्व मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, मोहन राकेश, ओमप्रकाश वाल्मीकि
निष्कर्ष:
हिंदी उपन्यास का विकास सरल सामाजिक आख्यान से लेकर जटिल मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और राजनीतिक विमर्शों तक का सफर है। यह लगातार अपने रूप, शिल्प और विषय के स्तर पर प्रयोगशील रहा है। आज यह विधा समाज के हर वर्ग, हर पहचान और हर ज्वलंत मुद्दे को अपने में समेटती हुई, हिंदी साहित्य का सबसे सजीव और गतिशील अंग बनी हुई है।
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