वीरेन डंगवाल: परिचय

वीरेन डंगवाल: परिचय

वीरेन डंगवाल (5 अगस्त, 1947 – 28 सितंबर, 2015) हिंदी के प्रसिद्ध जनपक्षधर कवि, आलोचक एवं अनुवादक थे। उनकी कविताएँ समकालीन सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती हैं तथा आम आदमी के संघर्ष और आक्रोश को मुखर आवाज देती हैं। वे 'दुष्चक्र में स्रष्टा' जैसी चर्चित कविता के रचयिता के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

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प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा:

· जन्म: 5 अगस्त, 1947 को काठगोदाम, नैनीताल (उत्तराखंड) में।
· शिक्षा: स्नातक तक की शिक्षा कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल से प्राप्त की। बाद में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली से हिंदी साहित्य में एम.ए. किया।
· उनकी रचनात्मकता पर जेएनयू के प्रगतिशील वातावरण और नक्सलबाड़ी आंदोलन का गहरा प्रभाव पड़ा।

कार्यक्षेत्र:

· उन्होंने दूरदर्शन में नौकरी की और इग्नू (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय) में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया।
· वे सक्रिय रूप से प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और साहित्यिक-सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया।

साहित्यिक विशेषताएँ एवं रचना-संसार:

1. काव्य भाषा एवं शिल्प:
   · उनकी कविताओं की भाषा सहज, ठोस, मुहावरेदार और अत्यंत प्रभावशाली है। वे जनभाषा के शब्दों और लोकप्रिय मुहावरों को काव्यात्मक अभिव्यक्ति में ढालने में माहिर थे।
   · उनकी शैली में व्यंग्य और विडंबना का अनूठा मिश्रण है, जो पाठक को झकझोर देता है।
   · वे छंद और मुक्त छंद दोनों में सिद्धहस्त थे।
2. विषय-वस्तु:
   · सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ: उनकी कविताएँ सत्ता के दुष्चक्र, भ्रष्टाचार, बाजारवाद, साम्प्रदायिकता और शोषण के खिलाफ एक तीखा हस्तक्षेप हैं।
   · जनसंघर्ष की अभिव्यक्ति: वे मजदूर, किसान, महिलाएँ और हाशिए के समुदायों के दुःख-दर्द और प्रतिरोध के कवि हैं।
   · मानवीय मूल्यों का पक्षधर: उनकी रचनाओं में न्याय, समानता और मानवीय गरिमा के लिए गहरी ललक दिखाई देती है।
3. प्रमुख कृतियाँ:
   · कविता संग्रह:
     1. 'दुष्चक्र में स्रष्टा' (1994) – यह उनका सबसे चर्चित संग्रह है। शीर्षक कविता "दुष्चक्र में स्रष्टा" व्यवस्था के दुश्चक्र में फँसे रचनाकार की विवशता और आक्रोश को दर्शाती है।
     2. 'इसी दुनिया में' (2002) – इस संग्रह के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
     3. 'सहचर है समय' (2009)
   · आलोचना: 'कवि ने कहा' (2006)
   · अनुवाद: उन्होंने विश्व साहित्य की कई कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया, जैसे पाब्लो नेरूदा की कविताएँ, बर्तोल्त ब्रेख्त के नाटक आदि। उनका गालिब की ग़ज़लों का हिंदी पद्यानुवाद भी उल्लेखनीय है।
4. प्रसिद्ध पंक्तियाँ (उद्धरण):
   · "सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, / मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए।" ('दुष्चक्र में स्रष्टा' से)
   · "इसी दुनिया में रहना है, मुझे इसी दुनिया में। / न कोई जन्नत है, न दोजख है धरती के बाद।" ('इसी दुनिया में' से)

पुरस्कार एवं सम्मान:

· साहित्य अकादमी पुरस्कार (2004): कविता संग्रह 'इसी दुनिया में' के लिए।
· पद्मश्री (2009): साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए (उन्होंने यह पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था)।
· सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार।
· उत्तराखंड सरकार द्वारा 'साहित्य भूषण' सम्मान।

निधन:

28 सितंबर, 2015 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।

निष्कर्ष:

वीरेन डंगवाल हिंदी की प्रगतिशील काव्यधारा के एक सशक्त हस्ताक्षर थे। उनकी कविता सिर्फ साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक कार्रवाई थी। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से अन्याय के खिलाफ लगातार आवाज उठाई और सामान्य जन के हितों का पक्ष लिया। अपनी तीखी, विडंबनापूर्ण और यादगार अभिव्यक्ति के कारण वे समकालीन हिंदी कविता के सबसे महत्वपूर्ण और प्रासंगिक कवियों में गिने जाते हैं।

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