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ब्राम्ही बाराखडी

ब्राह्मी लिपि में हर व्यंजन में 'अ' ध्वनि छिपी होती है। इसमें 5 वर्ग (क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग, प-वर्ग), 4 अर्धस्वर (य, र, ल, व), और 4 ऊष्म/संघर्षी (श, ष, स, ह) व्यंजन हैं। सभी व्यंजनों पर 10 स्वर मात्राएँ (आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) लागू होती हैं। यहाँ सभी वर्गों की पूरी बाराखड़ी दी गई है: --- 1. क-वर्ग (कंठ्य - Velar) मात्रा क ख ग घ ङ मूल (अ) 𑀓 (क) 𑀔 (ख) 𑀕 (ग) 𑀖 (घ) 𑀗 (ङ) आ 𑀓𑀸 (का) 𑀔𑀸 (खा) 𑀕𑀸 (गा) 𑀖𑀸 (घा) 𑀗𑀸 (ङा) इ 𑀓𑀺 (कि) 𑀔𑀺 (खि) 𑀕𑀺 (गि) 𑀖𑀺 (घि) 𑀗𑀺 (ङि) ई 𑀓𑀻 (की) 𑀔𑀻 (खी) 𑀕𑀻 (गी) 𑀖𑀻 (घी) 𑀗𑀻 (ङी) उ 𑀓𑀼 (कु) 𑀔𑀼 (खु) 𑀕𑀼 (गु) 𑀖𑀼 (घु) 𑀗𑀼 (ङु) ऊ 𑀓𑀽 (कू) 𑀔𑀽 (खू) 𑀕𑀽 (गू) 𑀖𑀽 (घू) 𑀗𑀽 (ङू) ए 𑀓𑁂 (के) 𑀔𑁂 (खे) 𑀕𑁂 (गे) 𑀖𑁂 (घे) 𑀗𑁂 (ङे) ऐ 𑀓𑁃 (कै) 𑀔𑁃 (खै) 𑀕𑁃 (गै) 𑀖𑁃 (घै) 𑀗𑁃 (ङै) ओ 𑀓𑁄 (को) 𑀔𑁄 (खो) 𑀕𑁄 (गो) 𑀖𑁄 (घो) 𑀗𑁄 (ङो) औ 𑀓𑁅 (कौ) 𑀔𑁅 (खौ) 𑀕𑁅 (गौ) 𑀖𑁅 (घौ) 𑀗𑁅 (ङौ) --- 2. च-वर्ग (तालव्य - Palatal) मात्रा च छ ज झ ञ मूल (अ) 𑀘 (च) 𑀙 (छ) 𑀚 (ज) 𑀛 (झ) 𑀜 (ञ) आ 𑀘𑀸 (चा) 𑀙𑀸 (छा) 𑀚𑀸 (जा) 𑀛𑀸 (झा) ...

जो बीत गई सो बात गई हरिवंश राय बच्चन की कविता की समीक्षा

हरिवंश राय बच्चन की यह कविता "जो बीत गई सो बात गई" महज एक रचना नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का एक सशक्त वक्तव्य है। यह अतीत के मोह को त्यागकर वर्तमान में जीने का संदेश देती है और अपनी सरलता, गहरी बिम्ब-योजना तथा दार्शनिक दृष्टि के कारण साहित्य में अमर है। 🧐 प्रमुख विषय-वस्तु और संदेश · अतीत का त्याग (Letting Go): कविता का केंद्रीय विषय है। कवि "जो बीत गई सो बात गई" कहकर अतीत से चिपके रहने की निरर्थकता पर बल देता है। · अनित्यता का बोध (Impermanence): जीवन की क्षणभंगुरता को रेखांकित किया गया है। सितारे, फूल और प्याले जैसी चीज़ें टूटने-बिखरने के लिए ही बनी हैं, लेकिन यह नियति है, त्रासदी नहीं। · प्रकृति का साम्य (Equanimity): कवि प्रकृति से सीख लेने का आग्रह करता है। आकाश टूटे तारों पर, बाग़ मुरझाए फूलों पर और शराबख़ाना टूटे प्यालों पर शोक नहीं मनाते। यह जीवन का स्वाभाविक क्रम है। 🎨 शिल्प और अलंकार · बिम्ब-योजना (Imagery): सितारा, कुसुम, और मधु का प्याला जैसे बिम्ब प्रेम, रिश्तों या सपनों का प्रतीक हैं। इनके डूबने, सूखने या टूटने की कल्पना अत्यंत मार्मिक है। · अलंकार (Figu...

कभी धूप तो कभी छांव कभी प्रदीप काव्य की समीक्षा कीजिए

कवि प्रदीप (जिन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से सम्मानित किया गया) की यह रचना "कभी धूप तो कभी छांव" [0†L5] मूल रूप से 1971 की फिल्म 'धूप छांव' का एक गीत है [0†L6][6†L2], जो अपने गहरे दार्शनिक संदेश के कारण एक कालजयी रचना बन गई है। आइए, इसकी विस्तृत समीक्षा करते हैं: 📜 कविता का पूरा पाठ सुख-दुःख दोनों रहते जिसमें, जीवन है वो गाँव। कभी धूप, कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव।। ऊपरवाला पासा फेंके, नीचे चलते दाँव। कभी धूप कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव।। भले भी दिन आते जगत में, बुरे भी दिन आते। कड़वे-मीठे फल करम के यहाँ सभी पाते।। कभी सीधे कभी उल्टे पड़ते अजब समय के पाँव। कभी धूप कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव।। क्या खुशियाँ क्या गम, ये सब मिलते बारी-बारी। मालिक की मर्ज़ी पे चलती ये दुनिया सारी।। ध्यान से खेना जग-नदिया में बंदे अपनी नाव। कभी धूप कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव।। 1. 🧠 भाव-पक्ष (दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण) · जीवन की द्वंद्वात्मकता (Duality of Life): इस कविता का मूल स्वर जीवन के दो पहलुओं—सुख-दुख, धूप-छाँव—को स्वीकार करना है। यह कहती है कि जीवन इन दोनो...

अयोध्या सिंह उपाध्याय कर्मवीर काव्य की समीक्षा

अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की कविता "कर्मवीर" , हिंदी साहित्य की प्रेरणादायक विधा का एक अनुपम उदाहरण है। पिछली कविताओं (सोहनलाल द्विवेदी, बच्चन) के विपरीत, यह रचना जीवन के "कर दिखाने" (Action) के पक्ष को इतनी मजबूती से प्रस्तुत करती है कि यह मानो कर्मवीरों के लिए एक "आचार-संहिता" बन जाती है। आइए, इसकी विस्तृत समीक्षा करते हैं: 📜 कविता का पूरा पाठ देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं, रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं। काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं, भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं। हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले, सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले-फले। आज करना है जिसे, करते उसे हैं आज ही, सोचते-कहते हैं जो, कुछ कर दिखाते हैं वही। मानते जी की हैं, सुनते हैं सदा सबकी कही, जो मदद करते हैं अपनी, इस जगत में आप ही। भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं, कौन ऐसा काम है, वे कर जिसे सकते नहीं। जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं, काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं। आज-कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं, यत्न करने से कभ...

जो बीत गई सो बात गई हरिवंश राय बच्चन की कविता की समीक्षा

हरिवंश राय बच्चन की कविता "जो बीत गई सो बात गई" , उनकी प्रसिद्ध रचना 'मधुशाला' से बिल्कुल अलग, जीवन के क्षणभंगुर स्वरूप को स्वीकारने का एक सशक्त काव्य है। यह 'मूविंग ऑन' (आगे बढ़ने) का अंतिम उद्घोष है। आइए, इसकी विस्तृत समीक्षा करते हैं: 📜 कविता का पूरा पाठ जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया, अम्बर के आँगन को देखो कितने इसके तारे टूटे, कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फिर कहाँ मिले, पर बोलो टूटे तारों पर कब अम्बर शोक मनाता है? जो बीत गई सो बात गई। जीवन में वह था एक कुसुम, थे उसपर नित्य निछावर तुम वह सूख गया तो सूख गया, मधुवन की छाती को देखो सूखी कितनी इसकी कलियाँ, मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली, पर बोलो सूखे फूलों पर कब मधुवन शोर मचाता है? जो बीत गई सो बात गई। जीवन में मधु का प्याला था, तुमने तन-मन दे डाला था वह टूट गया तो टूट गया, मदिरालय का आँगन देखो कितने प्याले हिल जाते हैं, गिर मिट्टी में मिल जाते हैं जो गिरते हैं कब उठते हैं, पर बोलो टूटे प्यालों पर कब मदिरालय पछताता है? जो बीत गई सो बात गई। 1. 🧠 भाव-पक...

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती सोहनलाल द्विवेदी काव्य की समीक्षा

"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती" की साहित्यिक समीक्षा (Literary Criticism) करते समय हमें इसे केवल एक "प्रेरणादायक नारा" न मानकर, इसके भाव-पक्ष, कला-पक्ष और व्यावहारिक सीमाओं के दायरे में परखना चाहिए। यहाँ इसका विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत है: 1. भाव-पक्ष (दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण) · कर्मवाद की प्रतिष्ठा: यह कविता गीता के "कर्म करो, फल की चिंता मत करो" के सिद्धांत को सरल शब्दों में पेश करती है। द्विवेदी जी ने 'असफलता' को अंतिम सत्य न मानकर उसे 'एक चुनौती' (चुनौती) की संज्ञा दी है, जो आधुनिक मनोविज्ञान की 'ग्रोथ माइंडसेट' (विकासशील मानसिकता) से मेल खाता है। · संघर्ष का स्वर: चींटी (लघुता) और गोताखोर (जोखिम) के प्रतीकों के माध्यम से कवि ने यह बताया है कि सफलता का आकार प्रयास के आकार पर नहीं, बल्कि उसकी सातत्य (निरंतरता) पर निर्भर करता है। 2. कला-पक्ष (शिल्प एवं भाषागत विशेषताएँ) · भाषा की सरलता: यह कविता खड़ी बोली में लिखी गई है, जिसमें कोई कठिन अलंकार (उपमा, रूपक) नहीं हैं। यह जानबूझकर की गई चाल है—सरल शब्द (जैसे - नन्हीं ची...

नालंदा विश्वविद्यालय

नालंदा विश्वविद्यालय जिसे नालंदा महाविहार के नाम से भी जाना जाता है, विश्व के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था। आइए, इसकी आचार्य परंपरा, उत्खनन में प्राप्त अभिलेखों और अवशेषों के साथ इसका विस्तृत परिचय जानें। 🏛️ स्थापना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं शताब्दी ई. (लगभग 427 ई.) में गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम (शक्रादित्य) द्वारा की गई थी। यह मगध (वर्तमान बिहार) में स्थित था और अगले 700 वर्षों तक शिक्षा का एक महान केंद्र रहा। इसके विकास में हर्षवर्धन और  पाल वंश के शासकों का विशेष योगदान रहा। प्राचीन नालंदा केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि एक महाविहार (बौद्ध मठ) था, जहाँ हजारों विद्यार्थी और विद्वान रहते और अध्ययन करते थे। यह अपने आवासीय ढांचे के लिए जाना जाता था, जहाँ शिक्षक और छात्र दोनों रहते थे, जिससे यह विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय बना। 👨‍🏫 गौरवशाली आचार्य परंपरा नालंदा की आचार्य परंपरा अत्यंत समृद्ध रही। यहाँ के प्रसिद्ध आचार्यों ने न केवल बौद्ध दर्शन, बल्कि विभिन्न विषयों पर गहन विद्वता हासिल की थी: · ...