डॉ. सुशीला टाकभौरे का कहानी संग्रह 'चुनी हुई कहानीयाँ'
डॉ. सुशीला टाकभौरे का कहानी संग्रह 'चुनी हुई कहानीयाँ' (1997) हिंदी दलित साहित्य की एक मार्मिक धरोहर है। यह संग्रह केवल कहानियों का समूह नहीं, बल्कि उन करोड़ों चुप्पियों की आवाज़ है, जिन्हें समाज ने जाति के नाम पर अनसुना कर दिया। आइए इस महत्वपूर्ण कृति की विस्तार से समीक्षा करते हैं। 🖋️ रचनाकार: दलित चेतना का सशक्त हस्ताक्षर डॉ. सुशीला टाकभौरे का जन्म 4 मार्च 1954 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के एक निर्धन दलित वाल्मीकि परिवार में हुआ था। हिंदी साहित्य और डॉ. अंबेडकर विचारधारा में एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त, डॉ. टाकभौरे हिंदी की वरिष्ठ लेखिका, कवयित्री एवं नाटककार हैं। 'दलित साहित्य अकादमी' और 'प्रेमचन्द स्मृति कथा सम्मान' जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित, उनका लेखन दलित-संवेदना और स्त्री-सरोकारों को केन्द्र में रखता है। 📖 कृति का परिचय · प्रकाशन वर्ष: 1997 · कहानियों की संख्या: कुल 9 कहानियाँ · प्रकाशक: यह कृति वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है。 · स्वर और कथ्य: संग्रह की अधिकतर कहानियाँ 'विद्रोहात्मक' हैं और दलित समाज के जी...