Posts

नागानिका का नानाघाट अभिलेख : मूलपाठप्रस्तुति डॉ संघप्रकाश दुडेड संगमेश्वर कॉलेज सोलापुर

Image
नागानिका का नानाघाट अभिलेख : मूलपाठ प्रस्तुति डॉ संघप्रकाश दुडेड संगमेश्वर कॉलेज सोलापुर MA,SET,ph d ,D.Litt  [ बायीं दीवार पर ] १. [ॐ] (सिधं) नमो प्रजापति]१ नो धंमस नमो ईदस नो संकंसन-वासुदेवान चंद-सूरान२ [महि] मा [व] तानं चतुनं चं लोकपालानं यम वरुन-कुबेर-वासवानं नमो कुमारवरस [ ॥ ] [वेदि]३ सिरिस रञो २. …. [वी] रस सूरस अ-प्रतिहत-चकस दखि [ नप ] ठ-पतिनो ….४ ३. [मा] …… [बाला] य५ महारठिनो अंगिय-कुल-वधनस सगर गिरिवर-वल [ या ] य पथविय पथम वीरस वस य व अलह वंतठ ? …… सलसु महतो मह ….. ४. सिरिस …… ६ भारिया [य] [;] देवस पुतदस वरदस कामदस धनदस [वेदि] सिरि मातु [य] सतिनो सिरिमतस च मातु[य] सोम [;]…… ५. वरिय …….  [ना] गवर-दयिनिय मासोपवासिनिय गहतापसाय चरित-ब्रम्हचरियाय दिख-व्रत यंञ-सुंडाय यञा हुता धूपन-सुगंधा य निय ……. ६. रायस ……….७ [य]ञेहि विठं [।] वनो अगाधेय यंत्रो द[ख]ना दिना गावो बारस १० [+] २ असो च १[ । ] अनारभनियो यंञो दखिना धेतु …… ७. दखिनायो दिना गावो १००० [+] १०० हथी १० ….. ८. ……. स ससतरय [वा]सलठि २०० [+] ८० [+] ६ कुभियो रूपामयियो १० [+] ७ भि ….. ९. रिको यंञो दखिनायो दिना गाव...

नाणेघाट (पुणे/जुन्नर) का ब्राह्मी शिलालेख प्रस्तूति डॉ संघप्रकाश दुडेड संगमेश्वर कॉलेज सोलापुर MA,SET,ph,.d.D.Litt

Image
नाणेघाट (पुणे/जुन्नर) का ब्राह्मी शिलालेख (Naneghat Inscription) भारत और विशेष रूप से महाराष्ट्र के प्राचीन इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। यह शिलालेख पुणे जिले के जुन्नर के पास नाणेघाट की एक प्राकृतिक गुफा (प्रतिमागृह) में उकेरा गया है। १. लिपि और भाषा लिपि: प्राचीन ब्राह्मी लिपि (Brahmi Script). भाषा: प्राकृत भाषा (Prakrit Language - प्राकृत महाराष्ट्री का प्रारंभिक रूप). कालखंड: ईसा पूर्व पहली शताब्दी (लगभग २२०० वर्ष पूर्व का सातवाहन काल). २. शिलालेख की रचना एवं मुख्य विषय यह शिलालेख सातवाहन सम्राज्ञी रानी नागनिका (नायनिका) द्वारा उकेरवाया गया था। अपने पति राजा प्रथम सातकर्णी के निधन के पश्चात, अपने अल्पवयस्क पुत्र वेदिसिरी के शासनकाल में राज्य संचालन करते हुए उन्होंने इस वीरता और यज्ञों का विवरण दीवारों पर अंकित करवाया। A. मंगलाचरण (देवताओं की स्तुति) शिलालेख की शुरुआत धार्मिक आह्वान से होती है, जिसमें वैदिक और हिंदू देवताओं की वंदना की गई है: धर्म (Dharma), इंद्र (Indra), संकर्षण (बलराम), वासुदेव (कृष्ण), चंद्र, सूर्य और चारों दिशाओं के लो...

ब्राम्ही बाराखडी

ब्राह्मी लिपि में हर व्यंजन में 'अ' ध्वनि छिपी होती है। इसमें 5 वर्ग (क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग, प-वर्ग), 4 अर्धस्वर (य, र, ल, व), और 4 ऊष्म/संघर्षी (श, ष, स, ह) व्यंजन हैं। सभी व्यंजनों पर 10 स्वर मात्राएँ (आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) लागू होती हैं। यहाँ सभी वर्गों की पूरी बाराखड़ी दी गई है: --- 1. क-वर्ग (कंठ्य - Velar) मात्रा क ख ग घ ङ मूल (अ) 𑀓 (क) 𑀔 (ख) 𑀕 (ग) 𑀖 (घ) 𑀗 (ङ) आ 𑀓𑀸 (का) 𑀔𑀸 (खा) 𑀕𑀸 (गा) 𑀖𑀸 (घा) 𑀗𑀸 (ङा) इ 𑀓𑀺 (कि) 𑀔𑀺 (खि) 𑀕𑀺 (गि) 𑀖𑀺 (घि) 𑀗𑀺 (ङि) ई 𑀓𑀻 (की) 𑀔𑀻 (खी) 𑀕𑀻 (गी) 𑀖𑀻 (घी) 𑀗𑀻 (ङी) उ 𑀓𑀼 (कु) 𑀔𑀼 (खु) 𑀕𑀼 (गु) 𑀖𑀼 (घु) 𑀗𑀼 (ङु) ऊ 𑀓𑀽 (कू) 𑀔𑀽 (खू) 𑀕𑀽 (गू) 𑀖𑀽 (घू) 𑀗𑀽 (ङू) ए 𑀓𑁂 (के) 𑀔𑁂 (खे) 𑀕𑁂 (गे) 𑀖𑁂 (घे) 𑀗𑁂 (ङे) ऐ 𑀓𑁃 (कै) 𑀔𑁃 (खै) 𑀕𑁃 (गै) 𑀖𑁃 (घै) 𑀗𑁃 (ङै) ओ 𑀓𑁄 (को) 𑀔𑁄 (खो) 𑀕𑁄 (गो) 𑀖𑁄 (घो) 𑀗𑁄 (ङो) औ 𑀓𑁅 (कौ) 𑀔𑁅 (खौ) 𑀕𑁅 (गौ) 𑀖𑁅 (घौ) 𑀗𑁅 (ङौ) --- 2. च-वर्ग (तालव्य - Palatal) मात्रा च छ ज झ ञ मूल (अ) 𑀘 (च) 𑀙 (छ) 𑀚 (ज) 𑀛 (झ) 𑀜 (ञ) आ 𑀘𑀸 (चा) 𑀙𑀸 (छा) 𑀚𑀸 (जा) 𑀛𑀸 (झा) ...

जो बीत गई सो बात गई हरिवंश राय बच्चन की कविता की समीक्षा

हरिवंश राय बच्चन की यह कविता "जो बीत गई सो बात गई" महज एक रचना नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का एक सशक्त वक्तव्य है। यह अतीत के मोह को त्यागकर वर्तमान में जीने का संदेश देती है और अपनी सरलता, गहरी बिम्ब-योजना तथा दार्शनिक दृष्टि के कारण साहित्य में अमर है। 🧐 प्रमुख विषय-वस्तु और संदेश · अतीत का त्याग (Letting Go): कविता का केंद्रीय विषय है। कवि "जो बीत गई सो बात गई" कहकर अतीत से चिपके रहने की निरर्थकता पर बल देता है। · अनित्यता का बोध (Impermanence): जीवन की क्षणभंगुरता को रेखांकित किया गया है। सितारे, फूल और प्याले जैसी चीज़ें टूटने-बिखरने के लिए ही बनी हैं, लेकिन यह नियति है, त्रासदी नहीं। · प्रकृति का साम्य (Equanimity): कवि प्रकृति से सीख लेने का आग्रह करता है। आकाश टूटे तारों पर, बाग़ मुरझाए फूलों पर और शराबख़ाना टूटे प्यालों पर शोक नहीं मनाते। यह जीवन का स्वाभाविक क्रम है। 🎨 शिल्प और अलंकार · बिम्ब-योजना (Imagery): सितारा, कुसुम, और मधु का प्याला जैसे बिम्ब प्रेम, रिश्तों या सपनों का प्रतीक हैं। इनके डूबने, सूखने या टूटने की कल्पना अत्यंत मार्मिक है। · अलंकार (Figu...

कभी धूप तो कभी छांव कभी प्रदीप काव्य की समीक्षा कीजिए

कवि प्रदीप (जिन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से सम्मानित किया गया) की यह रचना "कभी धूप तो कभी छांव" [0†L5] मूल रूप से 1971 की फिल्म 'धूप छांव' का एक गीत है [0†L6][6†L2], जो अपने गहरे दार्शनिक संदेश के कारण एक कालजयी रचना बन गई है। आइए, इसकी विस्तृत समीक्षा करते हैं: 📜 कविता का पूरा पाठ सुख-दुःख दोनों रहते जिसमें, जीवन है वो गाँव। कभी धूप, कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव।। ऊपरवाला पासा फेंके, नीचे चलते दाँव। कभी धूप कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव।। भले भी दिन आते जगत में, बुरे भी दिन आते। कड़वे-मीठे फल करम के यहाँ सभी पाते।। कभी सीधे कभी उल्टे पड़ते अजब समय के पाँव। कभी धूप कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव।। क्या खुशियाँ क्या गम, ये सब मिलते बारी-बारी। मालिक की मर्ज़ी पे चलती ये दुनिया सारी।। ध्यान से खेना जग-नदिया में बंदे अपनी नाव। कभी धूप कभी छाँव, कभी धूप तो कभी छाँव।। 1. 🧠 भाव-पक्ष (दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण) · जीवन की द्वंद्वात्मकता (Duality of Life): इस कविता का मूल स्वर जीवन के दो पहलुओं—सुख-दुख, धूप-छाँव—को स्वीकार करना है। यह कहती है कि जीवन इन दोनो...

अयोध्या सिंह उपाध्याय कर्मवीर काव्य की समीक्षा

अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की कविता "कर्मवीर" , हिंदी साहित्य की प्रेरणादायक विधा का एक अनुपम उदाहरण है। पिछली कविताओं (सोहनलाल द्विवेदी, बच्चन) के विपरीत, यह रचना जीवन के "कर दिखाने" (Action) के पक्ष को इतनी मजबूती से प्रस्तुत करती है कि यह मानो कर्मवीरों के लिए एक "आचार-संहिता" बन जाती है। आइए, इसकी विस्तृत समीक्षा करते हैं: 📜 कविता का पूरा पाठ देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं, रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं। काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं, भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं। हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले, सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले-फले। आज करना है जिसे, करते उसे हैं आज ही, सोचते-कहते हैं जो, कुछ कर दिखाते हैं वही। मानते जी की हैं, सुनते हैं सदा सबकी कही, जो मदद करते हैं अपनी, इस जगत में आप ही। भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं, कौन ऐसा काम है, वे कर जिसे सकते नहीं। जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं, काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं। आज-कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं, यत्न करने से कभ...

जो बीत गई सो बात गई हरिवंश राय बच्चन की कविता की समीक्षा

हरिवंश राय बच्चन की कविता "जो बीत गई सो बात गई" , उनकी प्रसिद्ध रचना 'मधुशाला' से बिल्कुल अलग, जीवन के क्षणभंगुर स्वरूप को स्वीकारने का एक सशक्त काव्य है। यह 'मूविंग ऑन' (आगे बढ़ने) का अंतिम उद्घोष है। आइए, इसकी विस्तृत समीक्षा करते हैं: 📜 कविता का पूरा पाठ जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया, अम्बर के आँगन को देखो कितने इसके तारे टूटे, कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फिर कहाँ मिले, पर बोलो टूटे तारों पर कब अम्बर शोक मनाता है? जो बीत गई सो बात गई। जीवन में वह था एक कुसुम, थे उसपर नित्य निछावर तुम वह सूख गया तो सूख गया, मधुवन की छाती को देखो सूखी कितनी इसकी कलियाँ, मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली, पर बोलो सूखे फूलों पर कब मधुवन शोर मचाता है? जो बीत गई सो बात गई। जीवन में मधु का प्याला था, तुमने तन-मन दे डाला था वह टूट गया तो टूट गया, मदिरालय का आँगन देखो कितने प्याले हिल जाते हैं, गिर मिट्टी में मिल जाते हैं जो गिरते हैं कब उठते हैं, पर बोलो टूटे प्यालों पर कब मदिरालय पछताता है? जो बीत गई सो बात गई। 1. 🧠 भाव-पक...