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नाना पाटेकर का जीवन सफर: संघर्ष、अभिनय और पहचान - डॉ संघप्रकाश दुड्डे, एम ए, पीएचडी, सेट, डी .लिट

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नाना पाटेकर का जीवन सफर: संघर्ष、अभिनय और पहचान - डॉ संघप्रकाश दुड्डे, एम ए, पीएचडी, सेट, डी .लिट  सारांश नाना पाटेकर (जन्म: विश्वनाथ पाटेकर, 1 जनवरी 1951 — 8 अक्टूबर 2026) भारतीय सिनेमा के उन गिने-चुने अभिनेताओं में से थे जिन्होंने अपनी शारीरिक बनावट और पारंपरिक नायक की छवि से अलग हटकर विशुद्ध अभिनय शक्ति के बल पर लगभग पाँच दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। उनका जीवन सफर अत्यंत गरीबी、पारिवारिक त्रासदी और सामाजिक उपेक्षा से शुरू होकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों、फिल्मफेयर ट्राफियों और पद्म श्री तक पहुँचा। यह आलेख उनके बहुआयामी व्यक्तित्व—अभिनेता、रंगकर्मी、सैन्य अधिकारी、समाजसेवी—के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। --- 一、प्रारंभिक जीवन और संघर्ष की भूमिका नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उनका मूल नाम विश्वनाथ पाटेकर था。उनके पिता दिनकर पाटेकर एक चित्रकार थे और टेक्सटाइल व्यवसाय से भी जुड़े थे。परिवार में सात भाई-बहन थे, जिनमें से पाँच की असमय मृत्यु हो गई。 बचपन अत्यधिक आर्थिक तंगी में बीता। 1964 में पिता के...

हिंदी दिवस समारोह एवं पुरस्कार वितरण * आयोजक: मॉडर्न महाविद्यालय, पुणे

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मॉडर्न महाविद्यालय, पुणे द्वारा हिंदी दिवस के शुभ अवसर पर आयोजित कार्यक्रम का विस्तृत विवरण तथा मुख्य वक्ता डॉ. संघप्रकाश दुड्डे (विभागाध्यक्ष - हिंदी विभाग, संगमेश्वर कॉलेज, सोलापुर) के व्याख्यान का मुख्य सारांश निम्नलिखित है: कार्यक्रम विवरण  * आयोजन: हिंदी दिवस समारोह एवं पुरस्कार वितरण  * आयोजक: मॉडर्न महाविद्यालय, पुणे  * मुख्य वक्ता: डॉ. संघप्रकाश दुड्डे (विभागाध्यक्ष - हिंदी विभाग, संगमेश्वर कॉलेज, सोलापुर)  * विषय: हिंदी भाषा कौशल (श्रवण, मौखिक, पठन एवं लेखन कौशल) तथा प्रज्ञा के विभिन्न आयाम  * उपस्थिति: डॉ. सचिन सकटे, डॉ. अलका कांबले, डॉ. अनामिका सिंह, प्रा. समाधान भड़कूबे तथा ५०० से अधिक छात्र-छात्राएँ। डॉ. संघप्रकाश दुड्डे के व्याख्यान का विस्तृत सारांश डॉ. संघप्रकाश दुड्डे ने अपने वक्तव्य में हिंदी भाषा के प्रभावी प्रयोग और उसके सर्वांगीण विकास के लिए चार मूलभूत भाषा कौशलों तथा तीन प्रज्ञा रूपों के अंतर्संबंध को स्पष्ट किया: १. चार मूलभूत हिंदी भाषा कौशल  * श्रवण कौशल (Listening Skill): भाषा सीखने की पहली सीढ़ी सुनना है। एकाग्रता और ध्यानपूर्वक ...

. डॉ बी.आर. आंबेडकर की 11-दिवसीय तीर्थयात्रा का सुंदर ओवरव्यू (20–30 नवंबर 1956) प्रस्तुति डॉ संघप्रकाश दुडडे

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डॉ. बी.आर. आंबेडकर की 11-दिवसीय तीर्थयात्रा का सुंदर ओवरव्यू (20–30 नवंबर 1956) काठमांडू में आयोजित चौधें विश्व बौद्ध सम्मेलन के तुरंत बाद, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने अपने जीवन के अंतिम दिनों (देहत्याग से मात्र छह दिन पूर्व) में भारत और नेपाल के चार प्रमुख बौद्ध पवित्र स्थलों की एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा ( चितियाचारिका ) पूरी की । इस यात्रा में उनकी पत्नी डॉ. सविता आंबेडकर, प्रो. एम.बी. चिटनिस और श्री बी.एच. वराले उनके साथ थे । यात्रा की प्रमुख ऐतिहासिक रूपरेखा: दिन 1 (20 नवंबर - लुंबिनी) : काठमांडू से हवाई मार्ग द्वारा लुंबिनी पहुँचे । महामाया मंदिर में पंचांग प्रणाम और ध्यान के बाद वे सम्राट अशोक के स्तंभ के पास गए और भावविभोर होकर स्तंभ को गले लगाया । अशोक कालीन स्वर्णिम युग को याद करते हुए उनकी आँखों से आंसू बह निकले । दिन 2 (21 नवंबर - पटना से गया) : पटना में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल आर.आर. दिवाकर के साथ भोजन करने के बाद शाम को गया पहुँचे । कड़ाके की ठंड में अपने सहयोगियों के प्रति करुणा दिखाते हुए उन्होंने सभी को अपने ही कमरे...