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Showing posts from January, 2026

चतुराशीति-सिद्ध-प्रवृत्ति

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४८ महासिद्ध... वज्रयान तांत्रिक बौद्ध धर्म की दृष्टि से... अध्ययन चतुराशीति-सिद्ध-प्रवृत्ति (Caturaśīti-siddha-pravṛtti) वज्रयान तांत्रिक बौद्ध परंपरा का एक मूलभूत चरित्र ग्रंथ है। 'सिद्ध' का अर्थ है... चमत्कार नहीं, बल्कि स्वतंत्रता... वज्रयान तांत्रिक बौद्ध परंपरा में "सिद्ध" शब्द लोकसमझ के जादूगर या चमत्कारी पुरुष के लिए नहीं है... सिद्ध का अर्थ है बंधनमुक्त—शरीर, वाणी और मन, इन तीनों स्तरों पर क्लेशों पर पूर्ण विजय प्राप्त करने वाला साधक... चतुराशीति-सिद्ध-प्रवृत्ति (Caturaśīti-siddha-pravṛtti) ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी ईस्वी का वज्रयान तांत्रिक बौद्ध परंपरा का एक मूलभूत चरित्र ग्रंथ है, जिसकी रचना भारतीय बौद्ध विद्वान अभयदत्त श्री ने की... इस ग्रंथ में ८४ महासिद्धों के जीवन चरित्र प्रस्तुत किए गए हैं... ऐसे तांत्रिक गुरुओं के, जिनकी आध्यात्मिक साधना ने भारत और तिब्बत में आने वाले समय के वज्रयान बौद्ध धर्म के प्रवाह को आकार दिया.... मूल संस्कृत भाषा के इस ग्रंथ का बाद में तिब्बती भाषा में अनुवाद हुआ और यह बौद्ध तंत्र परंपरा का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आध...

हिंदी नवजागरण की अवधारणा

हिंदी नवजागरण की अवधारणा हिंदी नवजागरण 19वीं सदी के उत्तरार्ध और 20वीं सदी के पूर्वार्ध में उत्तरी भारत (विशेषकर हिंदी क्षेत्र) में घटित एक सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक और बौद्धिक आंदोलन था। यह भारतीय नवजागरण का एक अभिन्न अंग था, जिसका उद्देश्य हिंदी भाषा, साहित्य और समाज को आधुनिक बनाना, सामाजिक कुरीतियों का विरोध करना और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना था। मुख्य विशेषताएं एवं उद्देश्य: 1. हिंदी भाषा और साहित्य का उत्थान:    · खड़ी बोली हिंदी को साहित्यिक एवं राष्ट्रीय माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करना। उस समय फ़ारसी, उर्दू और अंग्रेज़ी का प्रभाव था।    · हिंदी पत्रकारिता, पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक गतिविधियों का विस्तार।    · साहित्य को जनता से जोड़ना और उसमें आधुनिक विचारों, राष्ट्रवाद और सामाजिक यथार्थ को स्थान देना। 2. सामाजिक सुधार:    · सती प्रथा, बाल विवाह, जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता, नारी शिक्षा के अभाव जैसी कुरीतियों की आलोचना और उनके उन्मूलन का प्रयास।    · तर्क, विज्ञान और मानवतावाद को बढ़ावा देना।    · धार्मिक पुन...

वकील साहब विनय मोहन शर्मा लिखित रेखाचित्र का विश्लेषण

विनय मोहन शर्मा द्वारा रचित 'रेखाचित्र' संग्रह में "वकील साहब" एक विशिष्ट और यथार्थपरक चरित्र है। लेखक ने उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को बड़ी ही सूक्ष्मता और जीवंतता से उकेरा है। उनका चरित्र-चित्रण इस प्रकार है: 1. बाह्य स्वरूप एवं व्यक्तित्व: वकील साहब एक प्रतिष्ठित, अनुभवी और गंभीर व्यक्तित्व के धनी हैं। उनकी वेशभूषा, चश्मे, और उनके हाव-भाव से ही उनकी विद्वता और गरिमा झलकती है। वे कानून के ज्ञाता तो हैं ही, साथ ही जीवन के गहन अनुभव से भी परिपूर्ण हैं। 2. विद्वता और वाक्पटुता: वे अत्यंत पढ़े-लिखे और विद्वान हैं। कानूनी ज्ञान के साथ-साथ उनका साहित्यिक, सामाजिक एवं दार्शनिक ज्ञान भी गहरा है। उनकी वाणी में तर्क और ओज है। वे अपनी बात को स्पष्ट, प्रभावशाली और तार्किक ढंग से रखने में माहिर हैं। 3. मानवीय संवेदना: विद्वता और गंभीरता के पीछे वकील साहब एक संवेदनशील हृदय के भी धनी हैं। वे मानवीय कमजोरियों और संघर्षों को समझते हैं। उनके भीतर न्याय के प्रति आग्रह है, साथ ही पीड़ित और साधारण लोगों के प्रति सहानुभूति भी। वे केवल कानूनी धाराओं की दुहाई नहीं देते, बल्कि नैतिकता औ...

पुस्तक समीक्षा: 'महाशूद्र' – लेखक: मोहनदास नैमिशराय

पुस्तक समीक्षा: 'महाशूद्र' – लेखक: मोहनदास नैमिशराय परिचय: मोहनदास नैमिशराय हिंदी दलित साहित्य के एक प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनकी रचना 'महाशूद्र' एक ऐतिहासिक-सामाजिक विश्लेषणात्मक ग्रंथ है जो भारतीय समाज में शूद्र (ओबीसी/बहुजन) वर्ग की स्थिति, इतिहास और अस्मिता की पड़ताल करती है। यह पुस्तक जाति व्यवस्था की जड़ों को समझने का एक प्रमुख प्रयास है। मुख्य विषय-वस्तु एवं तर्क: 1. ऐतिहासिक पुनर्वाचन:       नैमिशराय प्राचीन ग्रंथों (वेद, पुराण, स्मृतियों) के माध्यम से यह सिद्ध करते हैं कि शूद्र मूलतः शक्तिशाली, स्वतंत्र और समृद्ध समुदाय थे, जिन्हें ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने दासता और निम्नता में धकेला। वे शूद्रों को आर्यों के पूर्व-भारतीय निवासी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। 2. 'महाशूद्र' की अवधारणा:       लेखक का तर्क है कि शूद्र और अतिशूद्र (दलित) दोनों ही एक ही मूल समुदाय से हैं, जिन्हें बाद में विभाजित किया गया। 'महाशूद्र' शब्द से वे शूद्रों की गौरवशाली पहचान को पुनर्स्थापित करते हैं। 3. जाति व्यवस्था का विरोध:       पुस्तक मनुस्मृति और ब्राह्मणवादी ...

ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' (अंश) की समीक्षा

ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' (अंश) की समीक्षा ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' हिंदी साहित्य, विशेषकर दलित साहित्य में एक मील का पत्थर मानी जाती है। इसका एक अंश ही पाठक को वाल्मीकि के संघर्ष, अपमान और जातिगत उत्पीड़न की पीड़ा से सीधे सामना करा देता है। प्रमुख बिंदुओं की समीक्षा: 1. शीर्षक की सार्थकता:    'जूठन' शब्द स्वयं में एक गहरा प्रतीक है। यह केवल शारीरिक रूप से छुआ हुआ भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक जूठन को दर्शाता है – वह अछूतपन, तिरस्कार और वह सब कुछ जो समाज दलितों को 'जूठा' समझकर थोपता है। अंश में यह भाव साफ झलकता है। 2. भाषा और शैली:    वाल्मीकि की भाषा सीधी, मर्मस्पर्शी और बेबाक है। वह लाक्षणिकता या कलात्मकता के पीछे नहीं छिपते। उनकी शैली में एक रोंगटे खड़े कर देने वाली ईमानदारी है। अंश में वर्णित घटनाएं (जैसे स्कूल में भेदभाव, अपमानित होना) इतनी जीवंत हैं कि पाठक स्वयं को उस स्थिति में खड़ा पाता है। 3. जातिगत यथार्थ का खुला चित्रण:    वाल्मीकि ने ब्राह्मणवादी सामाजिक ढाँचे की क्रूरता को बिना लाग-लपेट के उजागर किया है। अंश में दलित बच्चो...

मनोविश्लेषणवाद (Psychoanalysis) का स्पष्टीकरण

मनोविश्लेषणवाद (Psychoanalysis) का स्पष्टीकरण मनोविश्लेषणवाद मनोविज्ञान की एक प्रमुख सैद्धांतिक और चिकित्सीय पद्धति है, जिसकी स्थापना सिगमंड फ्रायड (1856-1939) ने की। यह मानव व्यवहार, विशेष रूप से अचेतन मन की शक्तियों और संघर्षों को समझने पर केंद्रित है। मुख्य सिद्धांत: --- 1. अचेतन मन की भूमिका · फ्रायड के अनुसार, मानव मन तीन स्तरों में बंटा है:   · चेतन मन: वर्तमान में जिसके बारे में हम जानते हैं।   · अचेतन मन: वह भाग जहाँ दबी हुई इच्छाएँ, भय और संघर्ष होते हैं, जो व्यवहार को प्रभावित करते हैं।   · अवचेतन मन: ऐसी सूचनाएँ जो आसानी से चेतन में लाई जा सकती हैं। · अचेतन मन का प्रभाव स्वप्न, चूक (फ़्रॉयडियन स्लिप), और प्रतीकात्मक व्यवहार में देखा जा सकता है। 2. मानसिक संरचना (Id, Ego, Superego) · इड (Id): जन्मजात आवेगों (काम, आक्रामकता) से संचालित, सुख सिद्धांत पर काम करता है। · अहं (Ego): वास्तविकता सिद्धांत पर काम करता है, इड और वास्तविकता के बीच संतुलन बनाता है। · पराहं (Superego): आदर्शों और नैतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है (अंतरात्मा)। 3. मनोलैंगिक विकास के चरण · फ...

सावित्रीबाई ज्योतिबा फुले: जीवन और व्यक्तित्व

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सावित्रीबाई ज्योतिबा फुले: जीवन और व्यक्तित्व जीवन परिचय · जन्म: 3 जनवरी 1831, नायगाँव (महाराष्ट्र) · विवाह: 1840 में 9 वर्ष की आयु में ज्योतिबा फुले से · निधन: 10 मार्च 1897 (प्लेग के रोगियों की सेवा करते हुए) शैक्षिक एवं सामाजिक योगदान 1. भारत की प्रथम महिला शिक्षिका · 1848 में पुणे में भारत का पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया · स्वयं साक्षरता प्राप्त कर अन्य स्त्रियों को शिक्षित किया · समाज के विरोध के बावजूद अध्यापन जारी रखा 2. समाज सुधार आंदोलन · स्त्री शिक्षा: "ज्ञान के बिना विवेक नहीं, विवेक के बिना नैतिकता नहीं" · विधवा पुनर्विवाह: विधवाओं के कल्याण के लिए संघर्ष · बाल विवाह विरोध: कन्या शिशु हत्या के खिलाफ अभियान · अस्पृश्यता उन्मूलन: सभी जातियों के बच्चों को शिक्षा देना व्यक्तित्व की विशेषताएँ 1. साहसी एवं दृढ़निश्चयी · शिक्षा देते समय होने वाले पत्थरवाह को सहन करना · हमेशा अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी रखना (फेंके गए गोबर/कीचड़ के कारण) 2. कवयित्री एवं लेखिका · "काव्य फुले" (1854) और "बावनकाशी सुबोधरत्नाकर" (1892) की रचना · कविताओं के ...