पुस्तक समीक्षा: 'महाशूद्र' – लेखक: मोहनदास नैमिशराय
पुस्तक समीक्षा: 'महाशूद्र' – लेखक: मोहनदास नैमिशराय
परिचय:
मोहनदास नैमिशराय हिंदी दलित साहित्य के एक प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनकी रचना 'महाशूद्र' एक ऐतिहासिक-सामाजिक विश्लेषणात्मक ग्रंथ है जो भारतीय समाज में शूद्र (ओबीसी/बहुजन) वर्ग की स्थिति, इतिहास और अस्मिता की पड़ताल करती है। यह पुस्तक जाति व्यवस्था की जड़ों को समझने का एक प्रमुख प्रयास है।
मुख्य विषय-वस्तु एवं तर्क:
1. ऐतिहासिक पुनर्वाचन:
नैमिशराय प्राचीन ग्रंथों (वेद, पुराण, स्मृतियों) के माध्यम से यह सिद्ध करते हैं कि शूद्र मूलतः शक्तिशाली, स्वतंत्र और समृद्ध समुदाय थे, जिन्हें ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने दासता और निम्नता में धकेला। वे शूद्रों को आर्यों के पूर्व-भारतीय निवासी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
2. 'महाशूद्र' की अवधारणा:
लेखक का तर्क है कि शूद्र और अतिशूद्र (दलित) दोनों ही एक ही मूल समुदाय से हैं, जिन्हें बाद में विभाजित किया गया। 'महाशूद्र' शब्द से वे शूद्रों की गौरवशाली पहचान को पुनर्स्थापित करते हैं।
3. जाति व्यवस्था का विरोध:
पुस्तक मनुस्मृति और ब्राह्मणवादी साहित्य की कड़ी आलोचना करती है। यह दिखाती है कि कैसे धार्मिक ग्रंथों को हथियार बनाकर शूद्रों का शोषण किया गया।
4. सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ:
नैमिशराय फुले, आंबेडकर, पेरियार के विचारों को आगे बढ़ाते हुए बहुजन एकता की वकालत करते हैं। वे शूद्र-दलित-आदिवासी के साझा संघर्ष पर जोर देते हैं।
भाषा-शैली:
· भाषा तथ्यपरक, शोधपूर्ण और आक्रामक विमर्शशीलता से युक्त है।
· ऐतिहासिक प्रमाणों का व्यापक उपयोग (संदर्भ, उद्धरण, पुरातात्विक स्रोत)।
· शैली वैचारिक एवं प्रखर है, जो पाठक को झकझोरती है।
पुस्तक का महत्व:
1. बहुजन इतिहासबोध का निर्माण:
यह पुस्तक ब्राह्मणवादी इतिहास-लेखन के वर्चस्व को चुनौती देती है और शूद्रों का वैकल्पिक इतिहास प्रस्तुत करती है।
2. सामाजिक एकता का आह्वान:
'महाशूद्र' दलित-ओबीसी राजनीतिक एकता के लिए एक वैचारिक आधार तैयार करती है।
3. शैक्षिक उपयोगिता:
जाति अध्ययन, समाजशास्त्र और इतिहास के शोधार्थियों के लिए यह एक मूलभूत पाठ है।
आलोचनात्मक दृष्टि:
· कुछ इतिहासकार नैमिशराय के कुछ तर्कों को अतिवादी या अतिसरलीकृत मानते हैं।
· राजनीतिक एजेंडा स्पष्ट होने के कारण कुछ पारंपरिक विद्वान इसे वस्तुपरक इतिहास के बजाय वैचारिक ग्रंथ मानते हैं।
· भाषा कभी-कभी अकादमिक जटिलता लिए होती है, सामान्य पाठक के लिए कुछ कठिन।
निष्कर्ष:
'महाशूद्र' हिंदी दलित-बहुजन लेखन की एक सैद्धांतिक क्लासिक है। नैमिशराय ने केवल एक किताब नहीं लिखी, बल्कि शूद्र अस्मिता के पुनर्निर्माण का एक आंदोलन प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक जाति व्यवस्था के खिलाफ एक बौद्धिक हथियार के रूप में कार्य करती है और सामाजिक न्याय की लड़ाई में एक मील का पत्थर है।
विशेष टिप्पणी:
नैमिशराय की यह रचना ओबीसी वर्ग की राजनीतिक चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह दलित साहित्य को बहुजन साहित्य के व्यापक फलक पर ले जाती है। इसे "शूद्रों का सामाजिक-सांस्कृतिक घोषणापत्र" कहा जा सकता है।
सिफारिश:
यह पुस्तक उन सभी के लिए अनिवार्य पठन है जो भारतीय समाज की जटिलताओं, जाति के इतिहास और बहुजन विमर्श को गहराई से समझना चाहते हैं।
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