चतुराशीति-सिद्ध-प्रवृत्ति

४८ महासिद्ध... वज्रयान तांत्रिक बौद्ध धर्म की दृष्टि से... अध्ययन चतुराशीति-सिद्ध-प्रवृत्ति (Caturaśīti-siddha-pravṛtti) वज्रयान तांत्रिक बौद्ध परंपरा का एक मूलभूत चरित्र ग्रंथ है।

'सिद्ध' का अर्थ है... चमत्कार नहीं, बल्कि स्वतंत्रता...
वज्रयान तांत्रिक बौद्ध परंपरा में "सिद्ध" शब्द लोकसमझ के जादूगर या चमत्कारी पुरुष के लिए नहीं है... सिद्ध का अर्थ है बंधनमुक्त—शरीर, वाणी और मन, इन तीनों स्तरों पर क्लेशों पर पूर्ण विजय प्राप्त करने वाला साधक... चतुराशीति-सिद्ध-प्रवृत्ति (Caturaśīti-siddha-pravṛtti) ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी ईस्वी का वज्रयान तांत्रिक बौद्ध परंपरा का एक मूलभूत चरित्र ग्रंथ है, जिसकी रचना भारतीय बौद्ध विद्वान अभयदत्त श्री ने की... इस ग्रंथ में ८४ महासिद्धों के जीवन चरित्र प्रस्तुत किए गए हैं... ऐसे तांत्रिक गुरुओं के, जिनकी आध्यात्मिक साधना ने भारत और तिब्बत में आने वाले समय के वज्रयान बौद्ध धर्म के प्रवाह को आकार दिया.... मूल संस्कृत भाषा के इस ग्रंथ का बाद में तिब्बती भाषा में अनुवाद हुआ और यह बौद्ध तंत्र परंपरा का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आधार सिद्ध हुआ....
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि यह ज्ञान प्राप्ति के मार्ग को रूढ़ चौखटों से परे ले जाता है.... मछुआरे, गड़रिये, किसान, राजा, भिक्षु और स्त्री जैसी विभिन्न सामाजिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि से आए महासिद्ध यहाँ दिखाई देते हैं.... प्रत्येक कथा में उस सिद्ध की अज्ञानावस्था, गुरु से मुलाकात, तांत्रिक दीक्षा, साधना और अंततः सिद्धि प्राप्ति का अनुसरण किया गया है... इन कथाओं में नैतिक बोध, योग साधना के प्रतीक और लोक परंपरा के तत्वों का सम्मिलन है, और यहाँ जाति, वर्ण और पेशे से परे जाकर बोध संभव है, यह मूलभूत बौद्ध संदेश स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है....
चतुराशीति-सिद्ध-प्रवृत्ति (Caturaśīti-siddha-pravṛtti) का तिब्बती बौद्ध परंपरा पर गहरा प्रभाव पड़ा और ८४ सिद्धों पर आधारित थंका चित्र, मंदिरों की भित्तिचित्रकारी और महासिद्ध-चरित्र परंपरा इस ग्रंथ से प्रेरित हुईं। काग्यू और साक्य पंथों में साधना के नैतिक आदर्शों पर भी इस ग्रंथ की छाप देखने को मिलती है.... आधुनिक काल में कीथ डाउमन जैसे विद्वानों ने इस ग्रंथ के अनुवाद और आलोचनात्मक अध्ययन प्रकाशित किए, और आज भी यह ग्रंथ प्रारंभिक तांत्रिक बौद्ध धर्म में सामाजिक समावेशिता और अनुभव आधारित मुक्ति मार्ग को समझने के लिए एक प्रमुख संदर्भ माना जाता है...

चतुराशीति-सिद्ध-प्रवृत्ति (Caturaśīti-siddha-pravṛtti) के ८४ महासिद्धों के जीवन चरित्र क्रम से हैं: लुईपा... विरूपा... सरहपा... कान्हपा (कृष्णाचार्य)... डोंबीपा... मीनपा (मत्स्येन्द्रनाथ)... गोरक्षपा (गोरखनाथ)... नागार्जुन... शांतिदेव... तिलोपा... नारोपा... भुसुकुपा... शबरपा... घण्टपा... डोम्बीहरिपा... धाम्पा... कुक्कुरिपा... कंभलपा... चर्पटिपा... कण्हपा (दूसरा)... धोकरीपा... गंधारिपा... लीलापा... चौरंगीपा... जालंधरिपा... भद्रपा... महिपा... धूनीपा... कोरप्पा... पुतलीपा... जोगीपा... कंसपा... लक्किपा... मगणिपा... धनिपा... डोंगरिपा... भान्हपा... तन्तिपा... मेखला... कनखला... लक्ष्मीकरा... सुकसिद्धा... इंद्रभूती... पद्मसंभव... राहुलभद्र... कर्णरीपा... तंत्रिपा... वज्रघण्टपा... शीलपा... भिक्षुकपा... कौलिकपा... डमरुपा... नागबोधि... धूपिपा... कण्ठिपा... भैरवपा... गहुलिपा... महादेवपा... कालिचरणपा... यक्षपा... वज्रिपा... चक्रपा... कपालिपा... वामनपा... पद्मपा... शशिपा... आनंदपा... कुम्भिपा... जटिलपा... ब्रह्मणिपा... सोमपा... धर्मपा... ज्ञानपा... भद्रकीर्ति... वज्रनाग... दीपंकर... शीलभद्र... काश्यप... धर्मकीर्ति... विमलमित्र... ज्ञानश्री... बोधिपा... वज्रबोधि... पद्मवज्र...

८४ महासिद्ध कोई आधिकारिक, कठोर सूची नहीं है, बल्कि अनुभवों की जीवंत परंपरा है.... अलग-अलग समय में, भूभाग में, सामाजिक स्थिति में जन्मे ये नाम—लुईपा से लेकर लक्ष्मीकरा तक—सबने एक ही कसौटी का सामना किया... क्लेशों का अंत.... करुणा का उदय..... प्रज्ञा की ज्योति....

वज्रयान में सत्य वैचारिक नहीं होता.... वह अनुभवसिद्ध होता है.... असत्य का अर्थ है अज्ञान—अपने अनुभव को नकारकर उधार ली हुई श्रद्धा.... इसीलिए सिद्धों के नाम... आख्यायिकाएं.... स्थानीय कथन... ये "इतिहास और प्रमाण" की आधुनिक कसौटी में नहीं फंसते....

यहाँ कसौटी एक ही है... क्या साधना से क्लेश क्षीण हुए?... क्या करुणा बढ़ी?... क्या प्रज्ञा प्रकट हुई?.... यही असली सिद्धि है.... चमत्कार नहीं, बल्कि शरीर-मन की गुलामी से मुक्ति....

इस सूची में अनेक सिद्ध राजदरबारी नहीं थे.... कुछ किसान थे.... कुछ जुलाहे.... कुछ मछुआरे,... कुछ भिक्षुक,... कुछ स्त्रियाँ.... वज्रयान का धक्का यहीं है... साधना संन्यास में नहीं, बल्कि जीवन के बीच में, क्लेशों की ज्वाला में। डोंबीपा (भीख मांगने वाला), शबरपा (शबर जनजाति), कुक्कुरिपा (कुत्ते के साथ रहने वाला), चौरंगीपा (चार अंग वाला)—ये नाम ही सामाजिक परिधि की ओर इशारा करते हैं....

वज्रयान कहता है: जहाँ क्लेश तीव्र हों.... वहाँ प्रज्ञा की धार भी तीव्र.... समाज के किनारे खड़े होकर.... वहाँ की गंदे क्लेशों में डूब कर,... केंद्र को छूना.... यही सिद्धों का बागी मार्ग है....
तिलोपा.... नारोपा.... मार्पा.... मिलारेपा जैसी परंपरा "ग्रंथ" से ज्यादा अनुभव का संक्रमण है.... गुरु शिष्य को तंत्र देता है... मुद्रा, मंत्र, दृष्टि... लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है अहंकार... भेदने की पद्धति...
इसीलिए कुछ सिद्ध गुरुओं ने शिष्य को चौंका देने वाली कसौटियाँ दीं... नारोपा को तिलोपा ने नौ कठोर परीक्षाएं दीं, जिनमें क्रूरता नहीं थी... अविद्या पर शस्त्र थे।

यह संक्रमण शब्दों में नहीं मिलता.... वह गुरु की आँखों की ज्योति से, शिष्य के हृदय में उतरता है.... ग्रंथ पढ़कर सिद्ध नहीं हुआ जा सकता... गुरु के चक्कर में डूबकर ही....

वज्रयान में स्त्री उपास्य नहीं है,... वह उपासना की शक्ति है.... प्रज्ञा की जीवंत मूर्ति.... मेखला... कनखला की कथाओं में देह... लज्जा का भंग नहीं है... द्वैत का भंग है....

उन बहनों ने वैराग्य की साधना की.... देह को साक्षी रखकर मन को मुक्त किया। लक्ष्मीकरा... राजकन्या होकर भी अलिप्तता का मार्ग दिखाती है.... राजमहल में रहकर राजमहल से परे जाना....
यहाँ स्त्री प्रज्ञा है... करुणा की जोड़ीदार, द्वैत नष्ट करने वाली शक्ति... वज्रयान स्त्री को अधीन न करके, उसे करुणा के समान स्थान पर बिठाता है....

तंत्र पर "अराजक, भोग, हिंसा" के आरोप लगे... वज्रयान स्पष्ट कहता है: मद्य का अर्थ है.... आसक्ति का भंग, मैथुन का अर्थ है... द्वैत का विलय, मांस का अर्थ है.... अहंकार की कत्ल।

ये पंचमकार प्रज्ञाहीन व्यक्ति के लिए वर्जित हैं... वे जिसे प्रज्ञा प्राप्त हो गई है, उसके लिए क्लेशों का शस्त्र हैं.... इसीलिए सिद्धों का मार्ग गुप्त है.... लोकनाट्य नहीं....
तंत्र जीवन के केंद्र में खड़े होकर क्लेशों का सामना करना है... भोग नहीं, भोग से परे जाना है...
कुछ सिद्धों का योगदान तत्त्वज्ञान में गहरा है.... नागार्जुन की शून्यता रिक्तता नहीं है.... स्वभाव शून्यता है... स्थिर आत्मा नहीं, सभी स्वरूप शून्य....
शून्यता में डूबकर करुणा जागृत होती है... करुणा से प्रज्ञा धारदार.... नागार्जुन... शांतिदेव जैसे सिद्ध कहते हैं... शून्य खाली जगह नहीं है... वह सब कुछ भर देने वाली अनंतता है....
हिमालयी सीमांत, लोकदेवता, स्थानीय तांत्रिक प्रथाओं... को नष्ट किए बिना पद्मसंभव और विमलमित्र ने उनका बौद्धीकरण किया.... दमन नहीं... परिवर्तन...

तिब्बत में पद्मसंभव ने स्थानीय राक्षसों को धर्मांतरित किया.... अस्वीकार नहीं किया, समाविष्ट किया। विमलमित्र ने ओडिशा से हिमालय तक स्थानीय परंपराओं को प्रज्ञा से जोड़ा....
इसीलिए वज्रयान सांस्कृतिक दृष्टि से लचीला है... सीमांतों को केंद्र में लाने वाला.... मीनपा (मत्स्येन्द्रनाथ) और गोरक्षनाथ की परंपराओं के आसपास विवाद है... हिंदू योग? बौद्ध तंत्र?
वज्रयान की दृष्टि सरल है... जो क्लेश कम करे, वह धर्म; जो अहंकार बढ़ाए, वह अधर्म....

सीमाएं खींचने वाले लेबल से ज्यादा महत्वपूर्ण है फलश्रुति....
मीन-गोरक्ष परंपरा देह साधना के माध्यम से मन को मुक्त करती है... नाथ संप्रदाय में बौद्ध तत्त्वों का बीज छिपा हुआ है...

८४ की संख्या पूर्णता का चिह्न है... चार दिशाओं में सात-सात चक्र, देह-वाणी-मन का परिपूर्ण आवर्तन.... यह गणितीय सूची नहीं है; यह मानसिक नक्शा है....
प्रत्येक सिद्ध एक चक्र उजागर करता है.... क्लेशों का अंत, प्रज्ञा का उदय.... ८४ सिद्ध हमें उत्तर नहीं देते.... वे प्रश्न देते हैं.... क्या तुम समाज के किनारे खड़े हो?... वहाँ से केंद्र छुओ... क्या तुम नियमों में फंसे हो?... वहीं प्रज्ञा की दरार ढूंढो... क्या तुम चमत्कार ढूंढ रहे हो?... स्वतंत्रता ढूंढो... वज्रयान की नज़र से देखा जाए तो सत्य का अर्थ है अनुभव में उतरी हुई करुणा..... असत्य का अर्थ है उधार ली हुई श्रद्धा....
क्लेश होते हुए भी उनका गुलाम न रहना

वेदना होते हुए भी द्वेष न बढ़ाना

शून्यता का अनुभव होते हुए भी करुणा न खोना

यही है,
देह-वाणी-मन की स्वतंत्रता...
वज्रयान में सिद्धि अंतिम पदवी नहीं है,
वह एक स्थिति (state of being) है..
क्षण-क्षण नूतन...
सिद्ध आदर्श नहीं है,
वह आईना है।
वह हमसे पूछता है—
क्या तुम सुरक्षा में फंसे हो?...
या स्वतंत्रता का जोखिम उठाने को तैयार हो?..
सिद्ध उत्तर नहीं देता....
वह प्रश्न छोड़ जाता है...
और चला जाता है.... हमें स्वयं
सत्य... ढूंढने के लिए छोड़कर...बंधनमुक्त—शरीर, वाणी, मन, इन तीनों स्तरों पर क्लेशों पर पूर्ण विजय पाने का रास्ता दिखाकर...

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