सावित्रीबाई ज्योतिबा फुले: जीवन और व्यक्तित्व

सावित्रीबाई ज्योतिबा फुले: जीवन और व्यक्तित्व

जीवन परिचय

· जन्म: 3 जनवरी 1831, नायगाँव (महाराष्ट्र)
· विवाह: 1840 में 9 वर्ष की आयु में ज्योतिबा फुले से
· निधन: 10 मार्च 1897 (प्लेग के रोगियों की सेवा करते हुए)

शैक्षिक एवं सामाजिक योगदान

1. भारत की प्रथम महिला शिक्षिका

· 1848 में पुणे में भारत का पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया
· स्वयं साक्षरता प्राप्त कर अन्य स्त्रियों को शिक्षित किया
· समाज के विरोध के बावजूद अध्यापन जारी रखा

2. समाज सुधार आंदोलन

· स्त्री शिक्षा: "ज्ञान के बिना विवेक नहीं, विवेक के बिना नैतिकता नहीं"
· विधवा पुनर्विवाह: विधवाओं के कल्याण के लिए संघर्ष
· बाल विवाह विरोध: कन्या शिशु हत्या के खिलाफ अभियान
· अस्पृश्यता उन्मूलन: सभी जातियों के बच्चों को शिक्षा देना

व्यक्तित्व की विशेषताएँ

1. साहसी एवं दृढ़निश्चयी

· शिक्षा देते समय होने वाले पत्थरवाह को सहन करना
· हमेशा अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी रखना (फेंके गए गोबर/कीचड़ के कारण)

2. कवयित्री एवं लेखिका

· "काव्य फुले" (1854) और "बावनकाशी सुबोधरत्नाकर" (1892) की रचना
· कविताओं के माध्यम से सामाजिक जागरूकता फैलाई

3. मानवतावादी दृष्टिकोण

· 1897 में प्लेग महामारी के दौरान रोगियों की सेवा
· अपने दत्तक पुत्र यशवंत को प्लेग चिकित्सा के लिए प्रेरित किया

4. क्रांतिकारी चिंतन

· जाति और लिंग आधारित भेदभाव का विरोध
· धार्मिक रूढ़िवादिता की आलोचना

महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना

1. महिला सेवा मंडल (1852)
2. बालहत्या प्रतिबंधक गृह (विधवाओं के लिए आश्रय)
3. सत्यशोधक समाज में सक्रिय भागीदारी

विरासत एवं प्रासंगिकता

· भारत में महिला शिक्षा की नींव रखी
· सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्ष
· आधुनिक भारतीय नारीवाद की अग्रदूत
· 1998 में उनकी तस्वीर वाला डाक टिकट जारी

उनका प्रसिद्ध कथन

"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"

सावित्रीबाई फुले का सम्पूर्ण जीवन सामाजिक परिवर्तन, शैक्षिक क्रांति और मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने न केवल महिला शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि एक समतामूलक समाज के निर्माण के लिए संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

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