ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' (अंश) की समीक्षा

ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' (अंश) की समीक्षा

ओम प्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' हिंदी साहित्य, विशेषकर दलित साहित्य में एक मील का पत्थर मानी जाती है। इसका एक अंश ही पाठक को वाल्मीकि के संघर्ष, अपमान और जातिगत उत्पीड़न की पीड़ा से सीधे सामना करा देता है।

प्रमुख बिंदुओं की समीक्षा:

1. शीर्षक की सार्थकता:
   'जूठन' शब्द स्वयं में एक गहरा प्रतीक है। यह केवल शारीरिक रूप से छुआ हुआ भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक जूठन को दर्शाता है – वह अछूतपन, तिरस्कार और वह सब कुछ जो समाज दलितों को 'जूठा' समझकर थोपता है। अंश में यह भाव साफ झलकता है।
2. भाषा और शैली:
   वाल्मीकि की भाषा सीधी, मर्मस्पर्शी और बेबाक है। वह लाक्षणिकता या कलात्मकता के पीछे नहीं छिपते। उनकी शैली में एक रोंगटे खड़े कर देने वाली ईमानदारी है। अंश में वर्णित घटनाएं (जैसे स्कूल में भेदभाव, अपमानित होना) इतनी जीवंत हैं कि पाठक स्वयं को उस स्थिति में खड़ा पाता है।
3. जातिगत यथार्थ का खुला चित्रण:
   वाल्मीकि ने ब्राह्मणवादी सामाजिक ढाँचे की क्रूरता को बिना लाग-लपेट के उजागर किया है। अंश में दलित बच्चों के साथ शिक्षकों द्वारा किया गया मनोवैज्ञानिक और शारीरिक शोषण, उन्हें 'अछूत' समझा जाना, उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार – ये सभी चित्र समाज के कलंकित चेहरे को दिखाते हैं।
4. व्यक्तिगत संघर्ष और सामूहिक पीड़ा:
   यह आत्मकथा केवल वाल्मीकि की कहानी नहीं, बल्कि एक पूरे वर्ग की सामूहिक पीड़ा की दास्तान है। अंश पढ़ते हुए पाठक को एहसास होता है कि यह केवल एक व्यक्ति का अनुभव नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक विषमता का दस्तावेज है।
5. प्रतिरोध की आवाज:
   'जूठन' केवल पीड़ा की गाथा नहीं, बल्कि प्रतिरोध और आत्मसम्मान की घोषणा भी है। अंश में वाल्मीकि के भीतर पलता आक्रोश और स्वाभिमान साफ दिखाई देता है। यह दलित चेतना के उदय का प्रतीक है।
6. सामाजिक-ऐतिहासिक दस्तावेज:
   यह अंश स्वतंत्र भारत में जातिवाद के सूक्ष्म और स्थूल रूपों को दर्शाता है। यह साबित करता है कि स्वतंत्रता के बाद भी दलितों के साथ छुआछूत और भेदभाव बदस्तूर जारी रहा।

महत्व व प्रासंगिकता:

'जूठन' का अंश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था। जातिगत भेदभाव के आधुनिक रूपों को समझने के लिए यह एक आईना है। यह साहित्य के माध्यम से सामाजिक न्याय की बहस को और गहरा करता है।

निष्कर्ष:

ओम प्रकाश वाल्मीकि का 'जूठन' (अंश) हिंदी दलित आत्मकथा लेखन की एक क्लासिक कृति है। यह पाठक को झकझोर देती है, उसे असहज करती है और मानवीय गरिमा के प्रश्न खड़े करती है। इसकी शक्ति इसकी प्रामाणिकता और निर्भीकता में निहित है। यह न केवल साहित्य बल्कि समाजशास्त्र, इतिहास और मानवाधिकार का महत्वपूर्ण पाठ भी है।

संक्षेप में: 'जूठन' का अंश एक ऐसा साहित्यिक अस्त्र है जो जातिवाद के खिलाफ न केवल आवाज उठाता है, बल्कि पाठक की मानसिकता को चुनौती देकर बदलने का प्रयास भी करता है।

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