सुमित्रानंदन पंत की कविता “मोह”
सुमित्रानंदन पंत की कविता “मोह” छायावादी काव्य की एक अनूठी रचना है, जिसमें कवि के सम्मुख एक गहरा द्वंद्व प्रस्तुत होता है—एक ओर प्रकृति का अनंत सौंदर्य है, तो दूसरी ओर नारी-सौंदर्य का मोह। यह कविता “पल्लव” संग्रह में संकलित है और जनवरी 1918 में रचित है।
🌿 द्वंद्व की केंद्रीयता
कविता का मूल स्वर एक असमंजस है। कवि पूछता है—जिसने अब तक प्रकृति की मृदु छाया, तरल तरंगों और इंद्रधनुष के रंगों में ही अपना मन लगाया है, वह अब नारी के “बाल-जाल” और “भ्रू-भंग” में अपने नेत्र और मन को कैसे उलझा दे? यह प्रश्न बार-बार दोहराया जाता है, जो द्वंद्व की गहराई को दर्शाता है।
🎭 प्रकृति और नारी-सौंदर्य का टकराव
कविता में प्रकृति के जो बिंब आए हैं—कोयल का कोमल बोल, मधुकर की वीणा, ऊषा की लालिमा—वे सब अत्यंत मधुर और सुकुमार हैं। कवि का झुकाव स्पष्टतः प्रकृति की ओर है। शोध-साहित्य में भी यह स्वीकार किया गया है कि इस कविता में कवि का झुकाव प्रकृति की तरफ ही है। नारी-सौंदर्य यहाँ एक चुनौती के रूप में उभरता है, न कि आकर्षण के सहज स्वीकार्य रूप में।
🎨 काव्य-शिल्प
· भाषा: तत्सम शब्दावली (“द्रुम”, “लोचन”, “श्रवण”, “अधरामृत”) के साथ लोक-सुलभ शब्दों का मेल है, जो पंत की विशिष्ट शैली है।
· अलंकार: “बाल-जाल”, “भ्रू-भंग”, “मृग-सा मन” जैसे प्रयोगों में रूपक और उपमा का सुंदर निर्वाह हुआ है।
· लय: प्रश्नवाचक पंक्तियों की पुनरावृत्ति कविता को एक आंतरिक लय देती है, जो पाठक को भी उसी द्वंद्व में खींच लेती है।
💡 निष्कर्ष
“मोह” वस्तुतः प्रकृति-प्रेम और मानवीय आकर्षण के बीच झूलती एक किशोर चेतना की कविता है। पंत की प्रकृति-निष्ठा यहाँ भी विजयी होती दिखती है—कवि अंततः प्रकृति की छाया को छोड़ने में असमर्थता व्यक्त करता है। यही कारण है कि यह कविता छायावाद की प्रकृति-केंद्रित सौंदर्य-दृष्टि का एक प्रामाणिक उदाहरण बनती है।
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