भारतेंदु हरिश्चंद्र की कविता "मूकरिया"
भारतेंदु हरिश्चंद्र की कविता "मूकरिया" (मूक + रिया, अर्थात् मूक प्राणी या बोल न सकने वाला) उनकी करुण रस की अत्यंत मार्मिक रचना है। यह कविता भारतेंदु की उस संवेदनशीलता को प्रकट करती है जो केवल मानव तक सीमित नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों तक फैली है।
🐦 केंद्रीय भाव: निरीह प्राणी की पीड़ा
कविता का मूल स्वर करुणा है। कवि एक मूक प्राणी (संभवतः पक्षी या पशु) के माध्यम से यह दिखाता है कि बोल न पाना ही सबसे बड़ी विवशता है। वह प्राणी अपनी पीड़ा, भूख, प्यास, भय और वेदना को शब्दों में नहीं कह सकता—केवल आँखों से या व्याकुल होकर व्यक्त कर सकता है। मनुष्य, जो बोल सकता है, अक्सर उसकी इस विवशता का लाभ उठाता है या उसकी पीड़ा को अनदेखा कर देता है।
🎭 मनुष्य और मूक प्राणी का अंतर्द्वंद्व
कविता में यह व्यंग्य भी निहित है कि मनुष्य स्वयं को "सभ्य" और "बुद्धिमान" कहता है, परंतु मूक प्राणियों के प्रति उसका व्यवहार निर्दयता से भरा होता है। वह उन्हें बाँधता है, काटता है, मारता है, और उनकी चीख-पुकार को अनसुना कर देता है। भारतेंदु यहाँ अहिंसा और दया का संदेश देते हैं।
🎨 काव्य-शिल्प
· भाषा: सरल, सहज और लोक-सुलभ। भारतेंदु की भाषा में ब्रज और खड़ी बोली का सुंदर मेल है।
· अलंकार: "मूकरिया" शब्द में वात्सल्य और करुणा का भाव; "आँखों से बोलना" जैसे प्रयोगों में व्यंजना शक्ति।
· लय: कविता में एक कोमल और द्रवित लय है, जो पाठक के हृदय को छू लेती है।
💡 निष्कर्ष
"मूकरिया" भारतेंदु की दयालुता, करुणा और प्रकृति-प्रेम का प्रतीक है। यह कविता हमें यह सिखाती है कि बोल न पाना कोई अपराध नहीं, बल्कि सुन न पाना मनुष्य का दोष है। भारतेंदु ने यहाँ हिंदी साहित्य में करुण रस की परंपरा को मजबूत किया और मूक प्राणियों के प्रति सहानुभूति का मार्ग प्रशस्त किया।
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