नालंदा विश्वविद्यालय

नालंदा विश्वविद्यालय जिसे नालंदा महाविहार के नाम से भी जाना जाता है, विश्व के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था। आइए, इसकी आचार्य परंपरा, उत्खनन में प्राप्त अभिलेखों और अवशेषों के साथ इसका विस्तृत परिचय जानें।

🏛️ स्थापना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं शताब्दी ई. (लगभग 427 ई.) में गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम (शक्रादित्य) द्वारा की गई थी। यह मगध (वर्तमान बिहार) में स्थित था और अगले 700 वर्षों तक शिक्षा का एक महान केंद्र रहा। इसके विकास में हर्षवर्धन और  पाल वंश के शासकों का विशेष योगदान रहा।

प्राचीन नालंदा केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि एक महाविहार (बौद्ध मठ) था, जहाँ हजारों विद्यार्थी और विद्वान रहते और अध्ययन करते थे। यह अपने आवासीय ढांचे के लिए जाना जाता था, जहाँ शिक्षक और छात्र दोनों रहते थे, जिससे यह विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय बना।

👨‍🏫 गौरवशाली आचार्य परंपरा

नालंदा की आचार्य परंपरा अत्यंत समृद्ध रही। यहाँ के प्रसिद्ध आचार्यों ने न केवल बौद्ध दर्शन, बल्कि विभिन्न विषयों पर गहन विद्वता हासिल की थी:

· नागार्जुन (द्वितीय शताब्दी ई.): महायान बौद्ध दर्शन के 'शून्यवाद' (माध्यमिक) सिद्धांत के प्रवर्तक और प्रसिद्ध ग्रंथ 'माध्यमिक शास्त्र' के रचयिता।
· आर्यदेव (चौथी शताब्दी ई.): नालंदा के प्रतिष्ठित आचार्यों में से एक, जिन्होंने 'माध्यमिक ब्रह्मघात' जैसी रचनाएँ कीं।
· दिङ्नाग (450-520 ई.): 'बौद्ध न्याय दर्शन' के जनक माने जाते हैं। उन्होंने 'तर्कपुंगव' की उपाधि प्राप्त की थी।
· धर्मपाल: प्रसिद्ध आचार्य जिन्होंने 'वर्णसूत्रवृत्ति' सहित कई ग्रंथों की रचना की। इन्हीं के शिष्य थे प्रसिद्ध शीलभद्र।
· शीलभद्र (585-640 ई.): नालंदा के प्रमुख आचार्य। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग (Xuanzang) इन्हीं के शिष्य थे। इन्होंने 'आर्य-बुद्धभूमि व्याख्यान' लिखा।
· शांतिदेव (7वीं शताब्दी ई.): 'बोधिचर्यावतार' और 'शिक्षासमुच्चय' जैसे अमर ग्रंथों के रचयिता।
· स्थिरमति (7वीं शताब्दी ई.): व्याकरण और दर्शन के विद्वान। 'विज्ञप्तिमात्रतासिद्धि' उनकी प्रमुख कृति है।
· चन्द्रगोमिन (7वीं शताब्दी ई.): 'चन्द्र व्याकरण' के प्रणेता और स्थिरमति के शिष्य थे।

इनके अलावा वसुबन्धु, चन्द्रकीर्ति, ज्ञानमति और शान्तरक्षित जैसे विद्वान भी इस विश्वविद्यालय से जुड़े थे।

🏚️ उत्खनन में प्राप्त अवशेष एवं अभिलेख

नालंदा की खोज 19वीं सदी में हुई। अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1861 में इसे नालंदा के रूप में पहचाना और 1915 से 1937 तक व्यापक उत्खनन हुआ।

प्रमुख अवशेष

· वास्तुशिल्प: 30 एकड़ (12 हेक्टेयर) में फैले इस परिसर में 11 विहार (आवासीय भवन) और 14 मंदिर शामिल हैं। मंदिर संख्या 3 सबसे पुराना ढांचा है।
· मूर्तियाँ: उत्खनन से बुद्ध, तारा, गणेश, विष्णु, सूर्य, कुबेर और हर-गौरी की असंख्य पत्थर, कांस्य और मिट्टी की मूर्तियाँ मिली हैं।
· मुद्राएँ (सील्स): विभिन्न राजाओं (मौखरि, हर्ष) और व्यक्तिगत मुहरें मिली हैं।
· सिक्के: कुमारगुप्त प्रथम, नरसिंहगुप्त और गौड़ राजा शशांक के सोने के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
· अन्य सामग्री: 'धर्मचक्र' और 'भूमिस्पर्श मुद्रा' वाली बुद्ध मूर्तियाँ, ध्यान कक्ष, धार्मिक ग्रंथों के अवशेष और टेराकोटा कलाकृतियाँ।

महत्वपूर्ण अभिलेख

· राजा बालादित्य का अभिलेख: एक पत्थर के शिलालेख पर उल्लेख है कि राजा बालादित्य ने नालंदा में एक भव्य मंदिर बनवाया था।
· देवपालदेव का ताम्रपत्र: पाल वंश के राजा देवपालदेव के ताम्रपत्र का अभिलेख भी मिला है।
· समुद्रगुप्त का पीतल अभिलेख: गुप्त वंश के सम्राट समुद्रगुप्त का एक पीतल अभिलेख प्राप्त हुआ है।
· बालपुत्रदेव का दानपत्र: सुमात्रा (शैलेन्द्र वंश) के राजा बालपुत्रदेव का 9वीं शताब्दी का ताम्रपत्र मिला है, जो विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को दर्शाता है।

📚 पुस्तकालय एवं अंत

नालंदा का पुस्तकालय, जिसे 'धर्मगंज' कहा जाता था, प्राचीन विश्व का सबसे बड़ा पुस्तकालय था। इसमें 'रत्नसागर', 'रत्नोदधि' और 'रत्नरंजिका' नामक तीन बहुमंजिला इमारतें थीं। 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी के आक्रमण ने विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया, जहाँ विशाल पुस्तकालय को आग लगा दी गई।

 2016 में, प्राचीन नालंदा महाविहार के पुरातात्विक स्थल को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था। आज, इसकी स्मृति में राजगीर में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है।


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