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1)बाजार कविता जया जादवानी समीक्षा कीजिये?

जया जादवानी की कविता “बाजार” एक गहन और संवेदनशील रचना है जो समाज में व्याप्त उपभोक्तावाद और मानवीय मूल्यों के ह्रास को उजागर करती है। इस कविता में बाजार को एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो मनुष्य की भावनाओं, संवेदनाओं और नैतिकता को निगलता जा रहा है। कविता में जादवानी ने बाजार की चकाचौंध और उसकी चमक-दमक के पीछे छिपी वास्तविकता को बखूबी उकेरा है। वह दिखाती हैं कि कैसे बाजार में सब कुछ बिकाऊ हो गया है, यहाँ तक कि इंसान की आत्मा भी। उनकी भाषा सरल और प्रभावशाली है, जो पाठक को सीधे दिल में उतरती है। इस कविता में जादवानी ने बाजार के माध्यम से समाज की उन विडंबनाओं को उजागर किया है, जो अक्सर हमारी नजरों से ओझल रह जाती हैं। यह कविता हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम भी इस बाजार का हिस्सा बनकर अपनी असली पहचान खोते जा रहे हैं।

मैत्रेयी पुष्पा जीवन परिचय

मैत्रेयी पुष्पा मैत्री पुष्पा एक प्रसिद्ध भारतीय लेखिका हैं, जो मुख्य रूप से हिंदी साहित्य में अपने योगदान के लिए जानी जाती हैं। उनका लेखन समाज के विभिन्न पहलुओं, विशेषकर महिलाओं के जीवन और संघर्षों पर केंद्रित है। मुख्य बिंदु: प्रारंभिक जीवन : मैत्री पुष्पा का जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा भी वहीं से प्राप्त की। लेखन शैली : उनकी लेखन शैली में ग्रामीण जीवन, महिलाओं की समस्याएं और सामाजिक मुद्दों का सजीव चित्रण होता है। उनकी कहानियाँ और उपन्यास समाज के यथार्थ को बखूबी दर्शाते हैं। प्रमुख कृतियाँ : उनकी प्रमुख कृतियों में “इदन्नमम”, “चाक”, “अल्मा कबूतरी”, “झूला नट” और “गोमा हंसती है” शामिल हैं। इन कृतियों ने उन्हें हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। पुरस्कार और सम्मान : मैत्री पुष्पा को उनके साहित्यिक योगदान के लिए कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी शामिल  मैत्रेयी पुष्पा  हिंदी लेखिका हैं। उन्हें हिन्दी अकादमी दिल्ली का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। [ 1 ] मैत्रेयी पुष्पा मैत्रेयी पुष्पा जीवन...

नाला सोपारा प्राचीन बौद्ध स्तूप

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सोपारा: मुंबई के पास स्थित मंदिर, पोत, तीर्थ एवं पर्यटक स्थल मुंबई भारत की वित्तीय राजधानी है। लोकप्रिय मान्यता यह कहती है कि मुंबई महानगर के यशस्वी इतिहास का आरंभ औपनिवेशिक काल के साथ होता है। किन्तु वास्तविकता यह है कि केवल आज के आधुनिक मुंबई को ही अंग्रेजों ने बनाया था। मुंबई का वास्तविक इतिहास उससे कहीं अधिक प्राचीन है। ऐतिहासिक दृष्टि से, आज की मुंबई का प्राचीनतम विधान सोपारा से आता है जिसे अब नालासोपारा कहते हैं। नालासोपारा को मुंबई का एक तुच्छ उपनगर माना जाता है। विडंबना यह है कि मुंबई से संबंधित प्राचीनतम ऐतिहासिक प्रमाण इसी स्थान से प्राप्त होते हैं। ये प्रमाण अशोक के ९वें अध्यादेश के रूप में है जो नगर के छत्रपती शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय में रखा हुआ है। सम्राट अशोक का शिलालेख ३ री ईपू सोपारा को प्राचीनकाल में शुर्पारक(शुरपारक) कहा जाता था। इस स्थान का एक वैभवशाली इतिहास है। भारत के पश्चिमी तट पर एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के रूप में ही नहीं, अपितु एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में भी यह प्रसिद्ध था। सोपारा के मिस्र, यूनान, रोम तथा मध्य पूर्वी क्षेत्रों से व्यापारिक संबंध ...

प्राचीन बौद्ध स्तूप वास्तुकला -डॉ संघप्रकाश दुड्डे

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 प्राचीन बौद्ध स्तूप वास्तुकला (Stupa Architecture) स्तूप (शाब्दिक रूप से “ढेर” या “ढेर”) एक अवशेष है, एक मंदिर जिसमें एक पवित्र या संत व्यक्ति के अवशेष और उनसे जुड़ी कलाकृतियाँ (अवशेष) हैं, जो 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से पहले भारत में पवित्र पुरुषों की कब्रों के रूप में उत्पन्न हुए थे और बाद में बुद्ध को समर्पित पवित्र स्थलों में विकसित हुए (563 – लगभग 483 ईसा पूर्व)  । बाद में,  बौद्ध अर्हतों (संतों), बोधिसत्वों (प्रबुद्ध लोगों), अन्य संतों या स्थानीय देवताओं के सम्मान में भी स्तूप बनाए गए।  स्तूप एक  अर्धगोलाकार संरचना  है, जिसके शीर्ष पर एक शिखर होता है, जो कभी-कभी आधार पर स्थित होता है जो आकार और आकार में भिन्न होता है (उस विशेष स्तूप के निर्दिष्ट उद्देश्य के आधार पर) जो आगंतुकों के लिए पैदल मार्ग से घिरा होता है। बौद्ध धर्म पहला भारतीय धर्म था जिसे पूजा के लिए बड़े सामुदायिक स्थानों की आवश्यकता थी। इससे  तीन प्रकार के वास्तुशिल्प स्वरूप  सामने आए  स्तूप, विहार और चैत्य। पहली शताब्दी ईसा पूर्व – पहली शताब्दी ईस्वी के बीच कई धार्मिक बौद्ध ...

फुलवा रत्नकुमार सभरिया की कहानी की समीक्षा कीजिये?

रत्नकुमार सांभरिया की कहानी “फुलवा” दलित समाज की बदलती सामाजिक स्थिति और संघर्षों को दर्शाती है। यह कहानी 1997 में हंस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी और सांभरिया जी की पहली कहानी थी 1 2 . कहानी का सारांश:  फुलवा एक दलित महिला है जो अपने पति की मृत्यु के बाद अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाने का सपना देखती है। वह जमींदार की टहलुवाई कर अपना और अपने बेटे का पेट भरती है। उसका बेटा राधामोहन पढ़-लिखकर पुलिस का बड़ा अधिकारी बन जाता है। जब जमींदार रामेश्वर सिंह फुलवा के घर आता है, तो वह उसकी भव्यता देखकर हक्का-बक्का रह जाता है। अंततः रामेश्वर का हृदय परिवर्तन होता है और वह फुलवा की सामाजिक स्थिति को स्वीकार करता है 2 . समीक्षा: सामाजिक यथार्थ:  कहानी दलित समाज की बदलती सामाजिक स्थिति को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है। यह दिखाती है कि शिक्षा और संघर्ष के माध्यम से दलित समाज अपनी स्थिति को कैसे सुधार सकता है 1 . चरित्र चित्रण:  फुलवा का चरित्र एक मजबूत और संघर्षशील महिला का प्रतीक है। उसकी दृढ़ता और संकल्प उसे एक प्रेरणादायक पात्र बनाते हैं 2 . सामाजिक संदेश:  कहानी जातिवा...

नेता -संजीव कहानी की समीक्षा कीजिये?

 प्रश्न- नेता -संजीव कहानी की समीक्षा कीजिये? उत्तर-नेता”  संजीव की एक महत्वपूर्ण कहानी है, जो समाज और राजनीति के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है। यह कहानी एक नेता के जीवन और उसकी महत्वाकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जो समाज में बदलाव लाने की कोशिश करता है। कहानी की मुख्य बातें: कथानक : कहानी का मुख्य पात्र एक नेता है, जो अपने आदर्शों और सिद्धांतों के लिए संघर्ष करता है। वह समाज में सुधार लाने के लिए कड़ी मेहनत करता है, लेकिन उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। चरित्र चित्रण : संजीव ने नेता के चरित्र को बहुत ही गहराई से उकेरा है। उसकी महत्वाकांक्षाएं, संघर्ष, और अंतर्द्वंद्व को बहुत ही प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया गया है। सामाजिक संदेश : कहानी समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, नैतिक पतन और राजनीतिक दांव-पेंच को उजागर करती है। यह दिखाती है कि कैसे एक व्यक्ति अपने आदर्शों के लिए संघर्ष करता है और समाज में बदलाव लाने की कोशिश करता है। समीक्षा: कहानी की सबसे बड़ी ताकत इसकी यथार्थवादी प्रस्तुति है। संजीव ने बहुत ही संवेदनशीलता से समाज और राजनीति के विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत क...

कागज की नावे चांदी के बाल -सूर्यबाला कहानी की समीक्षा कीजिये?

कागज की नावें चांदी के बाल”  सूर्यबाला की एक प्रसिद्ध कहानी है, जो मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की गहराई को दर्शाती है। इस कहानी में लेखक ने बचपन की मासूमियत और जीवन की कठोर वास्तविकताओं के बीच के संघर्ष को बहुत ही संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है। कहानी की मुख्य बातें: कथानक : कहानी का मुख्य पात्र अपने बचपन की यादों में खो जाता है, जहाँ वह कागज की नावें बनाकर खेलता था। यह नावें उसके लिए सिर्फ खेल का साधन नहीं थीं, बल्कि उसके सपनों और उम्मीदों का प्रतीक थीं। भावनात्मक गहराई : कहानी में बचपन की मासूमियत और जीवन की कठोर सच्चाइयों के बीच का संघर्ष बहुत ही मार्मिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। यह दिखाता है कि कैसे समय के साथ हमारे सपने और उम्मीदें बदल जाती हैं। लेखन शैली : सूर्यबाला की लेखन शैली सरल और प्रभावी है। उन्होंने बहुत ही सहजता से मानवीय भावनाओं को शब्दों में पिरोया है, जिससे पाठक कहानी से जुड़ाव महसूस करता है। समीक्षा: कहानी की सबसे बड़ी ताकत इसकी भावनात्मक गहराई है। सूर्यबाला ने बहुत ही संवेदनशीलता से बचपन की मासूमियत और जीवन की कठोर सच्चाइयों को प्रस्तुत किया है। कहानी का अं...