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द्वितीय धम्म संगीति

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द्वितीय धम्म संगीति भगवन बुद्ध के परिनिर्वाण के सौ वर्ष पर गंभीर विवाद को निपटाने के लिए दूसरी परिषद को एक सौ साल बाद बुलाया  गया। यह दस छोटे नियमों को तोड़ने वाले कुछ भिक्षुओं का संदर्भ है। उन्हें दिया गया था: एक सींग में नमक का भंडारण। मध्याह्न के बाद भोजन करना। एक बार भोजन करना और फिर से भिक्षा के लिए गाँव जाना। एक ही इलाके में रहने वाले भिक्षुओं के साथ उपोसथ समारोह का आयोजन। जब संघ सभा अधूरी थी तब आधिकारिक कार्य किया गया। एक निश्चित अभ्यास का पालन करना और मुल संघ के नियम को नज़रअंदाज़ करना , क्योंकि यह एक शिक्षक या शिक्षक द्वारा किया गया था। भोजन के बाद दोपहर में  खट्टा दूध या दही खाना  किण्वित होने से पहले मजबूत पेय का सेवन करना। एक गलीचा या आसान का उपयोग करना जो उचित आकार नहीं था  सोना और चांदी को दाना के रूप में स्वीकार करना  संघ नियम का उलंघन एक मुद्दा बन गया और एक बड़े विवाद का कारण बना क्योंकि इन नियमों को तोड़ना भगवन बुद्ध की मूल शिक्षाओं के विपरीत था। राजा कालशोक द्वितीय बौद्ध परिषद के संरक्षक थे और बैठक निम्नलिखित प...

विश्व वंदनीय तथागत भगवान बुद्ध धम्म सिद्धांत

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*गौतम बुद्ध*   गौतम बुद्ध (इ.स.पू. ५६३ – इ.स.पू. ४८३) हे भारतीय तत्त्वज्ञ व बौद्ध धर्माचे संस्थापक होते. शाक्य गणराज्याचा राजा शुद्धोधन व त्यांची पत्‍नी महाराणी महामाया (मायादेवी) यांच्या पोटी इ.स.पू. ५६३ मध्ये लुंबिनी येथे राजकुमाराचा जन्म झाला.  या राजकुमाराचे नाव ‘सिद्धार्थ’ असे ठेवण्यात आले. सिद्धार्थाच्या जन्मानंतर अवघ्या सातव्या दिवशीच त्यांची आई महामायाचे निधन झाले. आईचे छत्र हरवलेल्या सिद्धार्थाचा सांभाळ त्यांची मावशी व सावत्र आई महाप्रजापती गौतमीने केला. त्यामुळे राजकुमार सिद्धार्थाला ‘गौतम’ या नावानेही ओळखले जाते. राजकुमार सिद्धार्थ गौतमास आवश्यक असे सर्व शिक्षण देण्यात आले. यशोधरा या सुंदर राजकुमारीशी सिद्धार्थ गौतमाचा इ.स.पू. ५४७ मध्ये विवाह झाला व पुढे त्यांना राहुल नावाचा एक पुत्र झाला. बुद्ध      जन्म           सिद्धार्थ                   इ.स.पू. ५६३                   लुंबिनी, नेपाळ            ...

The Gift of Dhamma

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*The Gift of Dhamma* Goenkaji has often talked about the gifts of dana, the mental volition of the giver and the many ways to give dana. He talks about the supreme gift of Dhammadana, the transmission of the Dhamma in its pure form from teacher to student through the generations. In addition he points out that, even for those who are not teachers, there are ways to share in the giving of Dhammadana. Following is a selection of his words on this topic, drawn from various articles and talks. *Dhammadana* From a talk given by S.N. Goenka on January 15, 1976, on the occasion of the founding of Dhamma Thalt, Jaipur, Rajasthan. The taste of Dhamma surpasses all other tastes. Other tastes do not quench craving, they increase it. Only the taste of Dhamma puts an end to all craving. It quenches it. Hence it is the best. The gift of Dhamma surpasses all other dana. Giving dana towards a person’s worldly needs, although beneficial, gives a temporary benefit—a limited benefit. But the ...

ऐसे थे भगवान ! असीम करुणानिधान !

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🌹ऐसे थे भगवान ! असीम करुणानिधान ! [2]🌹 सन् 1947 देश के बँटवारे के दर्दनाक और शर्मनाक दिन। बँटे हुए दोनों भागों में बेरहम मानवी नरसंहार । एक भाग के बेशुमार लोगों का दूसरे भाग की ओर बेतहाशा पलायन। पुरखों की जिस धरती पर सदियों से रहते आये थे, उसे असुरक्षित पा कर भयसंकुल पलायन । अपना सब कुछ छोड़-छाड़ कर जान बचाने के लिए अधीर पलायन । परंतु इस पलायन में भी जान का खतरा था, सुरक्षा का सर्वथा अभाव था। बिहार के एक बूढ़े मुसलमान ने इस महापलायन के दौरान घर-बार छोड़ कर भाग निकलने का निर्णय किया। पड़ोस के एक सज्जन ब्राह्मण ने उसे बचाये रखने का बहुत आश्वासन दिया, पर वह अत्यंत भयभीत था, भागने पर ही तुला था। पश्चिमी पंजाब की सीमा तक का रास्ता बहुत लंबा था, खतरों से भरा था। दयालु पड़ोसी को एक युक्ति सूझी। उसने मित्र के दाढ़ी, मूंछ और सिर का मुंडन किया, पीछे एक छोटी सी चोटी रखी, माथे पर तिलक लगाया, कंधे पर जनेऊ पहनाई, गले में तुलसी की माला डाली, पीठ पर राम-नामी दुपट्टा ओढ़ाया और उसे “हरे राम, हरे राम" का पाठ सिखाकर किसी दूर की स्टेशन पर पश्चिम की ओर जाने वाली गाड़ी में बैठा कर भारी मन ...

मूर्ख की पहचान

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मूर्ख को जानें। ( Known as a fool.) बुद्धिमान को जानें। (Known as a wise.)      कैसे जानें ?   How to know? “एक मूर्ख को तीन बातों से जाना जाता है। कौन-सी तीन?  1. जब उन्होंने कोई गलती की है तो वे पहचान नहीं पाते हैं। 2. जब वे इसे पहचान लेते हैं तो वे इसके साथ ठीक से व्यवहार नहीं करते हैं।  3. और जब कोई और उनसे गलती स्वीकार करता है, तो वे इसे ठीक से स्वीकार नहीं करते हैं। ये तीन चीजें हैं जिनके द्वारा एक मूर्ख को जाना जाता है। एक बुद्धिमान व्यक्ति को तीन चीजों से जाना जाता है।  कौन-सी तीन?  1. वे पहचानते हैं कि उन्होंने कब गलती की।  2. जब वे इसे पहचान लेते हैं तो वे इससे ठीक से निपटते हैं।  3. और जब कोई और उनसे गलती कबूल करता है, तो वे इसे ठीक से स्वीकार करते हैं। ये तीन चीजें हैं जिनके द्वारा एक बुद्धिमान ( दक्ष ) व्यक्ति को जाना जाता है।  नमो बुद्धाय

चित्त के स्तर"

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"चित्त के स्तर" 〰🌼🌺🌼〰 प्रत्येक साधक की कुछ दिन ध्यान साधना करने के बाद यह जानने की इच्छा होती है कि मेरी कुछ ‘आध्यात्मिक प्रगति’ हुई या नहीं? क्या मैं साधना के नाम पर "भुस में लठ" तो नहीं मार रहा? इस बात से प्रेरित होकर आपको इस पोस्ट के माध्यम से अवगत करने की कोशिश कर रहा हूँ। ‘आध्यात्मिक प्रगति’ को नापने का मापदंड है- आपका अपना चित्त! आपका अपना चित्त कितना शुद्ध और पवित्र हुआ है, वही आपकी आध्यात्मिक स्थिति को दर्शाता है। अब आपको भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति जानने की इच्छा है, तो आप भी इन निम्नलिखित चित्त के स्तरों से अपनी स्वयं की आध्यात्मिक स्थिति को जान सकते हैं | बस, अपने ‘चित्त का प्रामाणिकता’ के साथ ही ‘अवलोकन’ करें, यह अत्यंत आवश्यक है। (1) दूषित चित्त👉   चित्त का सबसे निचला स्तर है, दूषित चित्त! इस स्तर पर साधक सभी के दोष ही खोजते रहता है। दूसरे, सबका बुरा कैसे किया जाए, सदैव इसी का विचार करते रहता है। दूसरों की प्रगति से सदैव ‘ईर्ष्या’ करते रहता है। नित्य नए-नए उपाय खोजते रहता है कि किस उपाय से हम दूसरे को नुकसान पहुँचा सकते है। सदैव नकारात्मक ...