शरणदाता कहानी के पात्रों का चरित्र चित्रण कीजिये
अज्ञेय की कहानी "शरणदाता" में पात्रों का चरित्र-चित्रण गहन मानवीय दुविधाओं को उजागर करता है। यह कहानी विभाजन के समय की पृष्ठभूमि में मित्रता, विश्वास और कर्तव्य के दार्शनिक प्रश्नों को उठाती है ।
यहाँ मुख्य पात्रों का विश्लेषण प्रस्तुत है:
1. देविन्दरलाल (वह जो शरण माँगता है)
· चिंतित एवं आशंकित व्यक्तित्व: देविन्दरलाल उस हिंदू समुदाय का प्रतिनिधि है, जो दंगों के भय में घिर गया है। अपने पड़ोसियों को खिसकते देख वह "लाचारी" महसूस करता है और स्वयं भी भागने की योजना बनाता है ।
· व्यावहारिक एवं संकोची: वह सीधे न कहकर, परिस्थिति की गंभीरता (भगदड़, शुबहा की नज़र) बताकर अपनी मजबूरी समझाता है । अपनी पत्नी को सुरक्षित स्थान पर (जालंधर) भेज देना भी उसकी सावधानी को दर्शाता है ।
· अपनों से विवश: वह रफ़ीकुद्दीन की दोस्ती और आश्वासन पर निर्भर है, क्योंकि उसका अपना कोई (जैसे नौकर सन्तू) भी उसे संकट में छोड़ भाग जाता है ।
2. रफ़ीकुद्दीन वकील (शरणदाता)
· आदर्शवादी एवं साहसी: वह बहुमत (मेजारिटी) का फर्ज़ निभाते हुए अल्पसंख्यक (माइनारिटी) की रक्षा को अपना कर्तव्य मानता है । उसका मानना है कि पड़ोसी की हिफ़ाजत किए बिना मुल्क की हिफ़ाजत नहीं की जा सकती ।
· व्यथित एवं भावुक: देविन्दरलाल के जाने की बात सुनकर वह "व्यथित स्वर" में कहता है, "आप भी!" - यह उसकी मित्रता और विश्वासघात जैसी पीड़ा को दिखाता है ।
· कर्तव्यपरायण मित्र: वह न केवल देविन्दरलाल को रोकता है, बल्कि उसे अपने घर शरण देता है, उसके घर की लूट को "परायज" (अपमानजनक) आँखों से देखता है, और देश की दशा पर उसके साथ चिंता करता है ।
· मजबूर कर्ता: अंततः वह विडंबना यह है कि स्वयं 'शरणदाता' होते हुए भी वह देविन्दरलाल को बाहरी दुनिया में नहीं निकलने देता, क्योंकि "खुदा जिसे घर से निकलता है, उसे फिर गली में भी पनाह नहीं देता" । यह उसकी अपनी सीमा को भी दर्शाता है।
3. अन्य पात्र (पृष्ठभूमि में)
· पड़ोसी हिंदू परिवार: ये भय के प्रतीक हैं। वे मुंह पर कुछ न कहकर ("सलाह क्या बणणी है, यहीं रह रहे हैं") चुपचाप खिसक जाते हैं, जो उस समय के आत्म-केन्द्रित अस्तित्व-संघर्ष को उजागर करता है ।
· सन्तू (पहाड़िया नौकर): यह सबसे निजी और करीबी शरण का प्रतीक है, जो खतरे के पहले संकेत पर ही मालिक को छोड़कर भाग जाता है । यह पात्र साबित करता है कि संकट में सबसे करीबी भी साथ छोड़ सकते हैं।
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इन पात्रों के माध्यम से अज्ञेय ने यह दिखाने की कोशिश की है कि विभाजन की विभीषिका में मनुष्य का सबसे बड़ा संकट उसकी अपनी नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का होता है। क्या आप इनमें से किसी पात्र के व्यवहार पर विशेष रूप से चर्चा करना चाहेंगे?
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