शरणदाता कहानी का कथानक
"शरणदाता" अज्ञेय की एक मार्मिक कहानी है, जो विभाजन के समय लाहौर में सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह एक हिंदू परिवार को शरण देने वाले उसके मुस्लिम मित्र की विवशता और मानवीय संबंधों के दुखद अंत की कहानी है।
📖 मुख्य कथानक
· प्रस्थान का दबाव: विभाजन के बाद लाहौर का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। हिंदू परिवार धीरे-धीरे अपने-अपने घर छोड़कर भाग रहे थे। देविंदरलाल भी अपना घर छोड़ना चाहते थे, लेकिन उनके पुराने मुस्लिम मित्र और पड़ोसी, वकील रफ़ीकुद्दीन ने उन्हें रोक लिया।
· विश्वास और शरण: रफ़ीकुद्दीन ने देविंदरलाल को अपनी सुरक्षा का पूरा भरोसा दिया और कहा कि अल्पसंख्यक की रक्षा करना बहुसंख्यकों का कर्तव्य है। इस विश्वास के चलते देविंदरलाल अपनी पत्नी को पहले ही सुरक्षित स्थान पर भेजकर, खुद वहीं रुक गए। कुछ ही दिनों में दंगे उनके मोहल्ले तक पहुँच गए और देविंदरलाल को अपनी आँखों के सामने अपना घर लूटते और जलते हुए देखना पड़ा।
· दबाव और विश्वासघात: रफ़ीकुद्दीन के घर शरण लिए देविंदरलाल की मौजूदगी से मुसलमानों के एक समूह को आपत्ति हुई। उन्होंने रफ़ीकुद्दीन पर एक हिंदू को शरण देकर "इस्लाम के साथ गद्दारी" करने का आरोप लगाया। इस दबाव में आकर रफ़ीकुद्दीन अपने मित्र को दूसरे स्थान पर ले गए।
· अंतिम धोखा: अंत में, देविंदरलाल को एक दूसरे मुस्लिम मित्र, शेख अताउल्लाह के यहाँ एक अंधेरी और बंद कोठरी में रखा गया। वहाँ उन्हें बेहद अपमानजनक और खतरनाक स्थिति का सामना करना पड़ा। खाने में मिली एक रोटी में छिपा जहर देकर उन्हें मारने की कोशिश की गई, और उनके एकमात्र साथी बिल्ली को वह खाना खिलाने पर उसकी मौत हो गई।
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