मेरी रूस यात्रा (अण्णा भाऊ साठे मूल कृति - अनुवादक: प्रो. डॉ. सदानंद भोसले): एक समीक्षात्मक शोध आलेख
मेरी रूस यात्रा (अण्णा भाऊ साठे मूल कृति - अनुवादक: प्रो. डॉ. सदानंद भोसले): एक समीक्षात्मक शोध आलेख
प्रो.डॉ.संघप्रकाश दुड्डे
हिंदी विभाग प्रमुख
संगमेश्वर कॉलेज सोलापुर(स्वायत्त)
smdudde@gmail.com
9766997174
प्रस्तावना
लोकशाहीर अण्णा भाऊ साठे मराठी साहित्य के एक असाधारण व्यक्तित्व थे। मात्र डेढ़ दिन स्कूल देख चुके इस लेखक ने अपनी लेखनी के बल पर महाराष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी और अपने साहित्य के माध्यम से दलित, शोषित और मेहनतकश जनता की आवाज़ बने। उनकी पुस्तक ‘माझा रशियाचा प्रवास’ (मेरी रूस यात्रा) केवल एक यात्रा वृत्तांत नहीं है, बल्कि एक विचारक का दृष्टिकोण, एक कलाकार की अवलोकन शक्ति और एक इंसान की मानवीयता का संगम है। प्रो. डॉ. सदानंद भोसले द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद ‘मेरी रूस यात्रा’ इस कृति के दायरे को बढ़ाता है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा प्रदान करता है। यह शोध आलेख इस कृति के ऐतिहासिक, साहित्यिक और सामाजिक संदर्भों का पता लगाते हुए, इस हिंदी अनुवाद के योगदान की समीक्षा भी करता है।
ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ
अण्णा भाऊ साठे विचारधारा से साम्यवादी थे। रूस की 1917 की अक्टूबर क्रांति ने शोषित वर्ग को जो स्थान दिलाया, लेनिन के विचार और मजदूरों का राज्य - इन सबका उनके मन में गहरा आकर्षण था। द्वितीय विश्व युद्ध में नाज़ियों के खिलाफ रूसी सेना ने स्टालिनग्राद में जो पराक्रम दिखाया, उस पर उन्होंने ‘स्तालिनग्राडचा पोवाडा’ (स्टालिनग्राद का पोवाड़ा) लिखा था, जिसका बाद में रूसी भाषा में भी अनुवाद हुआ और वहाँ अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए, 1961 में इंडो-सोवियत कल्चरल सोसाइटी के निमंत्रण पर हुई उनकी रूस यात्रा उनके लिए एक सपने के सच होने जैसी थी। यह यात्रा वृत्तांत उस सपने की पूर्ति की साक्षी है।
कृति का स्वरूप और विशेषताएँ
‘मेरी रूस यात्रा’ केवल एक देश का भ्रमण वृत्तांत नहीं है, बल्कि यह एक वैचारिक दृष्टिकोण है। इस पुस्तक की कुछ उल्लेखनीय विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
1. अवलोकन शक्ति: अण्णा भाऊ ने रूस की हर छोटी-बड़ी चीज़ को बारीकी से देखा है। मॉस्को की सड़कों पर सिगरेट की राख फेंकने के लिए बनाई गई व्यवस्था हो, रेलवे के डिब्बे में सफाई और सुविधाएँ हों या बाकू की समृद्धि - सब कुछ उनकी नज़र में है। वे लगातार भारत से तुलना करते हैं। मुंबई के बोरीबंदर स्टेशन की भीड़ को याद करके रूसी रेलवे में अनुशासन और सुविधाएँ देखकर उनका मन व्यथित हो जाता है, यह उनके लेखन से स्पष्ट होता है।
2. सहज और सुंदर शैली: अण्णा भाऊ की भाषा सहज, सरल और लोक जीवन से जुड़ी हुई है। उसमें कोई कृत्रिमता नहीं है। वे शब्दों के जादूगर हैं और बहुत साधारण भाषा में भी गहरे अर्थ प्रकट कर जाते हैं। उनकी भाषा में एक प्रकार का व्यंग्य है, जो कटु न होकर सोचने पर मजबूर करता है।
3. मानवीय चित्रण: इस यात्रा वृत्तांत में उन्होंने जिन व्यक्तियों से भेंट की, उनका चित्रण अत्यंत हृदयस्पर्शी है। लेनिनग्राद में मिलीं प्रोफेसर ततियाना (जिन्होंने मराठी-रूसी शब्दकोश बनाया था) हों या रेलगाड़ी में छोटे बच्चे के साथ यात्रा कर रही युवा माता। उस युवा माता के बारे में वे लिखते हैं कि यही बाल नागरिक बड़ा होकर अपनी मातृभूमि के लिए सौ बार मर सकता है, इसकी रूस को पूरी खातिर है। यह वर्णन लोगों को देखने की उनकी दूरदर्शिता को दर्शाता है।
4. पूर्वदीप्ति शैली (फ्लैशबैक) का उपयोग: इस यात्रा वृत्तांत के अंत में, ताशकंद से दिल्ली आते समय हवाई जहाज़ में बैठे हुए, वे पूर्वदीप्ति शैली का सुंदर उपयोग करते हैं। अतीत और वर्तमान की कड़ियाँ जोड़ते हुए उनकी विचार शैली और गहरी हो जाती है और पाठक को भावुक कर देती है।
समीक्षात्मक मूल्यांकन
अण्णा भाऊ का यह यात्रा वृत्तांत मराठी साहित्य की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है, फिर भी इस पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण से विचार करना भी आवश्यक है।
· वैचारिक निकटता: अण्णा भाऊ साम्यवादी विचारधारा के होने के कारण, उन्होंने रूस को अत्यधिक आदर और प्रेम से देखा है। इसलिए कृति में कहीं भी वहाँ की व्यवस्था पर कोई टिप्पणी नहीं मिलती। कुछ समीक्षकों को लग सकता है कि यह यात्रा वृत्तांत एक विशिष्ट विचारधारा के चश्मे से लिखा गया है, इसलिए यह पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं रह सका है।
· अतिशयोक्ति का आभास: मजदूर राज्य में समृद्धि, अवसरों की समानता और आनंदमय जीवन का वर्णन करते समय कभी-कभी अतिशयोक्ति का आभास होता है। लेकिन यह उनकी भावनात्मक निकटता थी, इसे ध्यान में रखना चाहिए।
· प्रो. डॉ. सदानंद भोसले के अनुवाद का योगदान: अण्णा भाऊ की यह अमूल्य कृति प्रो. भोसले के अनुवाद के कारण हिंदी भाषी पाठकों तक पहुँची है। अनुवाद एक अत्यंत कठिन कला है। मूल मराठी की लोकभाषा की जीवंतता, व्यंग्य और लय को हिंदी में लाते हुए प्रो. भोसले ने सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने केवल शब्दशः अनुवाद नहीं किया, बल्कि मूल कृति की आत्मा और भाव को जीवित रखा है। इससे यह पुस्तक अब राष्ट्रीय स्तर पर शोध और चर्चा का विषय बन सकी है।
निष्कर्ष
‘मेरी रूस यात्रा’ केवल एक देश की भौगोलिक यात्रा नहीं है, बल्कि एक क्रांतिकारी विचारक के मन की भूमि की यात्रा है। यह पुस्तक अण्णा भाऊ की कल्पनाशक्ति, अवलोकन शक्ति और मानवता में आस्था का दर्शन कराती है। एक ओर जहाँ यह रूस में विकास, अनुशासन और समानता की प्रशंसा करती है, वहीं दूसरी ओर भारत की असमानता, गरीबी और सामाजिक पीड़ाओं पर उंगली रखकर हमें सोचने पर मजबूर करती है। प्रो. डॉ. सदानंद भोसले का अनुवाद इस कृति के महत्व को रेखांकित करता है और इसे एक व्यापक आयाम प्रदान करता है। अण्णा भाऊ की यह पुस्तक एक स्वप्नद्रष्टा क्रांतिकारी की डायरी है, जिसने दुनिया के पहले मजदूर राज्य को अपनी आँखों से देखा और उन अनुभवों को अपनी लेखनी से अमर कर दिया। भारतीय समाज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस पुस्तक को फिर से पढ़ना और उस पर मनन करना अत्यंत आवश्यक है।
संदर्भ सूची
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