तोड़ती पत्थर कविता की समीक्षा कीजिए इसकी विशेषता स्पष्ट कीजिए
नीराला की कविता ‘तोड़ती पत्थर’ (संग्रह: अणिमा, 1943) हिंदी साहित्य की उन विरल रचनाओं में है, जहाँ सौंदर्य और करुणा का अद्भुत संगम है। यह कविता मजदूर स्त्री की प्रतीकात्मक और यथार्थपरक दोनों रूपों में अभिव्यक्ति है।
आइए, इसकी विस्तृत समीक्षा और विशेषताएँ समझते हैं:
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1. कथ्य-वस्तु (विषय-वस्तु)
कविता का बाह्य विषय पत्थर तोड़ने वाली एक गरीब स्त्री का दैनिक श्रम है। वह धूप, गर्मी और थकान की परवाह किए बिना पत्थर तोड़ती है।
लेकिन आंतरिक विषय श्रम की गरिमा और स्त्री-सौंदर्य का अपरिहार्य बोध है। नीराला ने मजदूरी को अभिशाप न मानकर उसे एक अनुष्ठान (यज्ञ) के रूप में चित्रित किया है। कवि उसके पसीने, तनाव और थकान में भी एक अद्भुत लय और संगीत देखता है।
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2. शिल्प-गत विशेषताएँ (काव्य-कला)
· मुक्त छंद का प्रयोग: यह कविता पारंपरिक मात्रिक या वर्णिक छंदों में नहीं बंधी है। नीराला ने यहाँ लयात्मक मुक्त छंद का प्रयोग किया है—'तोड़ती पत्थर, तोड़ती पत्थर' की पुनरावृत्ति से एक संगीतमयी गति पैदा होती है, जो हथौड़े की चोट की नकल करती है।
· प्रतीकात्मकता: 'पत्थर' केवल खनिज नहीं, बल्कि जीवन की कठोरता, विधाता की विडंबना और पुरुष-प्रधान समाज का बोझ है। स्त्री उसे तोड़कर अपने अस्तित्व पर विजय पाती है।
· बिम्ब-विधान: कविता में श्रव्य बिम्ब (हथौड़े की आवाज़), स्पर्श बिम्ब (धूप, पसीना) और दृश्य बिम्ब (लाल होता शरीर, उड़ते कण) अत्यंत सजीव हैं।
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3. भाव-सौंदर्य (करुणा और सौंदर्य का संतुलन)
नीराला ने दया-भीख माँगने वाली करुणा नहीं दिखाई, बल्कि कर्मठ करुणा दिखाई है—
"पसीने से लथपथ, श्रम-सीमा पर खड़ी,
धूप में पिघलता शिला-कठिन हृदय।"
वह दुखिया नहीं, तपस्विनी है। उसके 'भर भर के' हाथ, 'मैली चुनरी' और 'लाल होता अंग' में कवि को वैशाखी सुंदरता (उग्र, प्रखर, अकुंठित) दिखाई देती है—यही नीराला का वैशिष्ट्य है।
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4. नारी-चेतना
यह कविता नारी को पीड़िता न मानकर संघर्षशील नायिका के रूप में प्रस्तुत करती है। वह प्रकृति से, श्रम से और अपने भाग्य से दो-दो हाथ करती है। नीराला ने उसे माँ या प्रेयसी के पारंपरिक रूप में न देखकर 'शिल्प-सम्राज्ञी' (कला की रानी) का दर्जा दिया है।
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5. दार्शनिक पक्ष
कविता का अंत अत्यंत गूढ़ है—जब स्त्री पत्थर तोड़ती है, तो उसकी हर चोट सृष्टि-विधान को चुनौती देती है। कवि कहता है कि यह केवल पत्थर नहीं, बल्कि 'काल' (समय) को तोड़ने का कर्म है। इससे कविता आस्तिकता और आध्यात्मिकता के उच्चतर स्तर पर पहुँच जाती है।
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समग्र मूल्यांकन
‘तोड़ती पत्थर’ प्रगतिवाद और प्रतीकवाद के संगम पर खड़ी कविता है। यह नीराला की बंधन-विरोधी चेतना, श्रम-प्रतिष्ठा और प्रकृति-प्रेम का दस्तावेज है।
इसकी एकमात्र कठिनाई इसकी जटिल भाषा और अमूर्त बिम्ब हैं, जो आम पाठक के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, पर यही इसका साहित्यिक मूल्य भी है।
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