हिंदी एकांकी उद्भव और विकास स्पष्ट कीजिए
हिंदी एकांकी (एकांकी नाटक) नाटक विधा की ही एक लघु एवं प्रभावशाली शाखा है, जिसमें कथानक, संवाद और पात्रों को सीमित स्थान एवं समय (एक अंक) में प्रस्तुत किया जाता है। इसका उद्भव और विकास निम्नलिखित चरणों में स्पष्ट है:
1. उद्भव: प्रारंभिक रूप (19वीं सदी के अंत – 1920)
· पृष्ठभूमि: एकांकी का मूल रूप पाश्चात्य ‘वन-एक्ट प्ले’ से प्रभावित है, किंतु भारतेंदु युग में नाटकों के साथ-साथ कुछ लघु नाट्य-रचनाएँ होती थीं, जिन्हें एकांकी की संज्ञा नहीं दी गई थी।
· प्रारंभिक प्रयास: भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘मुद्राराक्षस’ आदि छोटे नाटक लिखे। इसी काल में बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र के भी लघु रूप मिलते हैं, किंतु एक स्वतंत्र विधा के रूप में एकांकी का जन्म बाद में हुआ।
· अवरोध: प्रारंभ में एकांकी को ‘नाटक का अपरिपक्व रूप’ समझा जाता था, इसलिए इसे साहित्यिक मान्यता नहीं मिली।
2. उत्थान काल: रेडियो और राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव (1930–1947)
· प्रमुख प्रेरक: आकाशवाणी (रेडियो) के प्रसार ने एकांकी को अत्यधिक बल दिया, क्योंकि लंबे नाटकों की अपेक्षा छोटी, प्रभावशाली रचनाएँ रेडियो के लिए उपयुक्त थीं।
· प्रमुख एकांकीकार:
· उपेंद्रनाथ ‘अश्क’ – ‘चोरी’, ‘कैदी’, ‘बूढ़ी काकी’ (सामाजिक यथार्थ, व्यंग्य)।
· लक्ष्मीनारायण मिश्र – ‘संस्कार’, ‘छुट्टी’ (राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक कुरीतियाँ)।
· हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ – ‘नाच घर’, ‘एक और कहानी’।
· भुवनेश्वर प्रसाद – ‘अकेले किसान’ (प्रगतिवादी धारा)।
· विशेषता: राष्ट्रीय आंदोलन, अस्पृश्यता, नारी-शोषण, गरीबी जैसे गंभीर विषयों को सघनता से प्रस्तुत किया गया।
3. स्वर्णकाल: प्रयोग और विविधता (1947–1970)
· स्वतंत्रता के बाद एकांकी ने नए सामाजिक और मनोवैज्ञानिक यथार्थ को समेटा। इस दौर में बड़े नाटककारों ने भी एकांकी लिखे, और अनेक संग्रह प्रकाशित हुए।
· प्रमुख हस्ताक्षर:
· जगदीश चंद्र माथुर – ‘शिलालेख’, ‘दूसरा सप्तक’ (प्रतीकात्मक, प्रयोगधर्मी)।
· मोहन राकेश – ‘बादलों के घेरे’, ‘लेकिन’ (मध्यमवर्गीय अकेलापन, अधूरे संबंध)।
· शरद जोशी – ‘तांता’, ‘एक रात’ (तीव्र व्यंग्य, सामाजिक विसंगतियाँ)।
· सुरेश अवस्थी – ‘जैसे करनी वैसे भरनी’, ‘भोलाराम का जीवन’ (हास्य-व्यंग्य)।
· धर्मवीर भारती – ‘गुढ़िया घर’, ‘बेचैनी’।
· मन्नू भंडारी – ‘बिना लकड़ी का घोड़ा’, ‘सौत’ (स्त्री-चेतना)।
· प्रकाशन: ‘एकांकी संग्रह’ प्रकाशन का चलन बढ़ा – जैसे शरद जोशी का ‘तांता और अन्य एकांकी’, माथुर का ‘एकांकी सम्राट’ आदि।
4. हास्य-व्यंग्य एवं यथार्थ का दौर (1970–1990)
· एकांकी तीखे व्यंग्य, सामाजिक-राजनीतिक भ्रष्टाचार और मध्यमवर्ग की विडंबनाओं का केंद्र बन गई।
· प्रमुख नाम:
· रमेश चंद्र ‘शशि’ – ‘एक नगर में बेगम एक’।
· सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (मुख्यतः कवि, किन्तु एकांकी भी – ‘बकरी’).
· कमलेश्वर – ‘फाँसी’, ‘रात का शिकार’ (सशक्त संवाद, कहानी शैली के निकट)।
· रामकुमार वर्मा – ‘धरती का दर्द’।
· प्रवृत्ति: लंबे नाटकों की अपेक्षा एकांकी अधिक सीधी और प्रभावशाली माध्यम बन गई। पत्र-पत्रिकाओं में एकांकियों का नियमित प्रकाशन होने लगा।
5. समकालीन एकांकी (1990 से वर्तमान)
· विषय विस्तार: स्त्री-विमर्श, दलित चेतना, लैंगिक अल्पसंख्यक, पर्यावरण, डिजिटल जीवन की समस्याएँ।
· प्रमुख एकांकीकार:
· ममता कालिया – ‘गर्भ’, ‘बदनाम गली’ (स्त्री शरीर और समाज)।
· चंद्रकांता – ‘मौन’, ‘अपना-अपना भगवान’।
· देवेन्द्र राज अंकुर – ‘मैं क्यूँ लिखता हूँ’, ‘मेरा बचपन’ (दलित अस्मिता)।
· अलका सरावगी – ‘कलिकथा’, ‘हम जिन्हें छोड़ आए’ (प्रयोगशील)।
· पंकज बिष्ट – ‘मौसमी नाटक’, ‘काला पानी’।
· मंच और डिजिटल माध्यम: रंगमंच पर एकांकी प्रतियोगिताएँ, यूट्यूब तथा ऑडियो-प्लेटफॉर्म (Spotify, Google Podcasts) पर एकांकियों का मंचन/प्रसारण बढ़ा है।
6. एकांकी की प्रमुख विशेषताएँ (सारांश)
· संक्षिप्तता: एक अंक, 20-40 मिनट का प्रदर्शन, सीमित पात्र (सामान्यतः 3-8)।
· एकता: स्थान, समय और क्रिया की एकता (एरिस्टोटल के नियमों का पालन अधिकांशतः)।
· प्रभाव तीव्रता: एक ही संघर्ष या मुद्दे पर केन्द्रित, कोई उप-कथानक नहीं।
· प्रयोगधर्मिता: मंच सामग्री का कम उपयोग, संवादों पर अधिक बल, कभी-कभी एकालाप का साहसिक प्रयोग।
निष्कर्ष
हिंदी एकांकी ने रेडियो के माध्यम से जन्म लिया, प्रगतिवाद और व्यंग्य से होती हुई स्वतंत्रताोत्तर मनोवैज्ञानिक यथार्थ तक का सफर तय किया, और अब स्त्री-दलित विमर्शों से लेकर डिजिटल प्रदर्शन तक विस्तारित हो गई है। यह हिंदी नाटक विधा का सबसे लचीला, सुलभ और समसामयिक रूप है।
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