हिंदी कहानी उद्भव और विकास स्पष्ट कीजिए
हिंदी कहानी साहित्य का उद्भव और विकास उपन्यास के समानांतर हुआ, लेकिन इसने अधिक तीव्रता से आधुनिक जीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त किया। कहानी एक संक्षिप्त, प्रभावशाली और लोकप्रिय विधा है, जिसका विकास निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:
1. उद्भव काल (19वीं सदी के अंत – 1900)
· प्रारंभ: आधुनिक हिंदी कहानी की शुरुआत किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इन्दुमती’ (1900) और प्रतापनारायण मिश्र के ‘जादूघर’ जैसी रचनाओं से मानी जाती है, यद्यपि ये अर्ध-कहानियाँ थीं।
· प्रभाव: बांग्ला (बंकिम, रवींद्र) और अंग्रेजी कहानियों का अनुवाद एवं अनुकरण। भारतेंदु युग में ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ और ‘सरस्वती’ पत्रिकाओं में कहानियाँ छपने लगीं।
· प्रवृत्ति: नैतिक उपदेश, सामाजिक सुधार, रूमानियत, पर कहानी-तत्व (कथानक, चरित्र, संवाद) अपरिपक्व।
2. प्रेमचंद युग (1910–1936) – कहानी का स्वर्णकाल
· मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी कहानी को सच्चा यथार्थवाद और जीवन-संघर्ष की गहरी अभिव्यक्ति दी। उनकी 300 से अधिक कहानियाँ जाति-पाति, विधवा-समस्या, किसान-गरीबी, राष्ट्रीयता और मनोविज्ञान को उकेरती हैं।
· प्रमुख कहानियाँ: ‘पूस की रात’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘नमक का दारोगा’, ‘कफन’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘ईदगाह’।
· अन्य प्रमुख कथाकार: जयशंकर प्रसाद (‘इंद्रजाल’, ‘ग्राम’), चतुरसेन शास्त्री, विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’।
3. प्रगतिवादी कहानी (1936–1950)
· वर्ग-संघर्ष, सामंतवाद-उन्मूलन, औद्योगिक शोषण, राष्ट्रीय आंदोलन की तीव्रता।
· प्रमुख कथाकार: यशपाल (‘दो घंटे की मुहलत’), रांगेय राघव, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर।
· जैनेन्द्र कुमार ने प्रगतिवाद से हटकर मनोवैज्ञानिक यथार्थ (‘वातायन’, ‘फाँसी’) को प्रधानता दी।
4. नई कहानी आंदोलन (1950–1970) – आधुनिकता का शिखर
· युद्ध, विभाजन, आंतरिक अकेलापन, मध्यम वर्ग की जटिल मानसिकता, अनुभव की नई बनावट। अज्ञेय, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, मन्नू भंडारी, अमरकांत।
· मोहन राकेश – ‘मलबे का मालिक’, ‘उसने कहा था’।
· राजेंद्र यादव – ‘पहेलियाँ’, ‘एक कहानी यह भी’।
· कमलेश्वर – ‘राजा निरबंसिया’, ‘मारे गए गुलफाम’।
· मन्नू भंडारी – ‘मैं हार गई’, ‘त्रिशंकु’।
· भीष्म साहनी – ‘चीफ की दावत’, ‘वे दिन वे लोग’ (बाद में उपन्यासकार भी)।
5. आंचलिक एवं ग्राम्य कहानी (1960–1980)
· फणीश्वरनाथ रेणु – ‘तीसरी कसम’ (शरत चंद्र की कहानी पर फिल्म), ‘लाल पान की बेगम’।
· शिवप्रसाद सिंह – ‘बाढ़’, ‘दुर्गम’।
· उदय प्रकाश, श्रीलाल शुक्ल (व्यंग्य-हास्य) – ‘राग दरबारी’ (उपन्यास) के अलावा कहानियाँ भी।
6. दलित, स्त्री एवं क्षेत्रीय चेतना (1980–2000)
· दलित कहानी: ओमप्रकाश वाल्मीकि (‘जूठन’), मोहनदास नैमिशराय, भीमराव शरद – इनमें छुआछूत, शोषण और अस्मिता का तीखा यथार्थ।
· स्त्री-विमर्श: कृष्णा सोबती (‘जयपराजय’), मृदुला गर्ग (‘रुख’, ‘गुलनार’), चित्रा मुद्गल, ममता कालिया – शरीर, अधिकार और स्त्री मनोदशा।
· नई कहानी के बाद की धाराएँ: संस्मरणात्मक, अर्ध-आत्मकथात्मक, उत्तर-आधुनिक बिखराव।
7. समकालीन कहानी (2000 से अब तक)
· वैश्वीकरण, प्रवासी जीवन, मीडिया-भाषा का प्रभाव, प्रेम-संबंधों की बहुलता, शहरी अकेलापन।
· प्रमुख कहानीकार: विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश, अनिल कुमार, संजीव, मंजरी शुक्ला, नासिरा शर्मा, राहुल सांकृत्यायन (नई पीढ़ी)।
· डिजिटल माध्यमों (वेब, ब्लॉग, ई-पत्रिकाओं) ने कहानी को नई गति और प्रयोग का अवसर दिया है।
निष्कर्ष: हिंदी कहानी ने एक शताब्दी में उपदेशशीलता से यथार्थ, मनोविज्ञान, प्रगतिवाद, नई कहानी के संघर्ष, दलित-स्त्री-क्षेत्रीय आवाज़ों से गुज़रते हुए वर्तमान के वैश्विक और बहुस्वरीय यथार्थ को सशक्तता से चित्रित किया है। यह हिंदी साहित्य की सबसे गतिशील विधा है।
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