हिंदी कविता उद्भव और विकास स्पष्ट कीजिए

हिंदी कविता का उद्भव और विकास एक लंबी एवं समृद्ध यात्रा रही है, जिसे मुख्यतः पाँच कालखंडों में समझा जा सकता है:

1. आदिकाल (वीरगाथा काल, ~1050-1375)

· उद्भव: चारण-भाटों की मुखर परंपरा से जन्मी, जिसमें राजाश्रय में वीरों के युद्ध-प्रेमी गाथागीत गाए जाते थे।
· प्रमुख कवि: चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो), नरपति नाल्ह, विद्यापति (प्रारंभिक).
· शैली: अपभ्रंश-अवहट्ट मिश्रित, वीर रस, बंदीजनों की परंपरा।

2. भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल, ~1375-1700)

· विकास: इस्लामी आक्रमण के बाद जन-जीवन में आत्मविश्वास हीनता, धार्मिक उथल-पुथल और वैष्णव आंदोलन का प्रभाव।
· उपशाखाएँ:
  · ज्ञानाश्रयी (निर्गुण): कबीर, रैदास, गुरु नानक, मलूकदास – इनमें रहस्यवाद, निराकार भक्ति एवं सामाजिक कटाक्ष।
  · प्रेमाश्रयी (सगुण, सूफी संगम): मंझन, जायसी (पद्मावत) – इसमें मानवीय प्रेम के माध्यम से ईश्वरीय प्रेम का चित्रण।
  · राम भक्ति शाखा: तुलसीदास (रामचरितमानस) – मर्यादा, लोक-कल्याण एवं भक्ति रस।
  · कृष्ण भक्ति शाखा: सूरदास, मीराबाई, नरसी मेहता, रसखान – शृंगार, माधुर्य भाव और वात्सल्य रस।
· भाषा: ब्रज, अवधी, मैथिली आदि लोक-भाषाओं में रचना।

3. रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल, ~1700-1900)

· विकास: मुगल साम्राज्य के पतन के साथ राजाश्रय कम हुआ, कवि दरबारों में आश्रित हुए। अलंकार, छंद, शृंगारिक नायिका-भेद, रसविद्या पर अत्यधिक जोर।
· प्रमुख कवि:
  · रीतिबद्ध: केशवदास, भूषण, मतिराम, बिहारी (सतसई) – नियमबद्ध अलंकार प्रिय।
  · रीतिमुक्त: घनानंद, बोधा, ठाकुर – भाव प्रधान, मुक्तिभाव।
· शैली: परिष्कृत ब्रजभाषा, क्लिष्ट अलंकार, शृंगार प्रधान (संयोग-वियोग)।

4. आधुनिक काल (1850–वर्तमान)

· भारतेंदु युग (1868-1893): भारतेंदु हरिश्चंद्र ने खड़ी बोली में राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार एवं हास्य-व्यंग्य लिखा। मैथिलीशरण गुप्त, प्रतापनारायण मिश्र।
· द्विवेदी युग (1893-1918): पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में ‘सरस्वती’ पत्रिका ने खड़ी बोली को स्थिर किया। राष्ट्रीयता, नीति, प्रकृति-चेतना। मैथिलीशरण गुप्त (साकेत), माखनलाल चतुर्वेदी।
· छायावाद (1918-1938): व्यक्तिवादी, कल्पनाशील, सौंदर्य-बोध, कोमल क्रांति। प्रमुख स्तंभ: जयशंकर प्रसाद (आँसू), सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (राम की शक्ति पूजा), सुमित्रानंदन पंत (पल्लव), महादेवी वर्मा (नीहार, यामा).
· प्रगतिवाद (1936-1950): सामाजिक यथार्थ, पीड़ित वर्ग, वर्ग-संघर्ष, औद्योगिकरण की चोट। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’।
· प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता (1950-1970): व्यक्ति की अंतर्व्यथा, नगर जीवन, तीक्ष्ण बिम्ब, नये बंधन-विध्वंस। अज्ञेय (त्रिशंकु, बावरा अहेरी), गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ (अंधेरे में), धर्मवीर भारती, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह।
· समकालीन कविता (1980 के बाद): दलित, स्त्री विमर्श, पर्यावरण, उत्तर-आधुनिकता, व्यंग्य एवं मौखिक खेल। विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल, उदय प्रकाश, अनामिका, अरुण कमल, कुमार विश्वास आदि।

निष्कर्ष: हिंदी कविता मौखिक वीरगाथा से प्रारंभ होकर भक्ति के गहरे आध्यात्मिक रस से गुजरी, फिर रीतिबद्ध सौंदर्यशास्त्र को पार करते हुए आधुनिक युग में खड़ी बोली के माध्यम से छायावादी कोमल क्रांति, प्रगतिवादी यथार्थ, और अब वैश्विक संदर्भों में अपनी बहुस्वरीय यात्रा जारी रखे हुए है।

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