जयशंकर प्रसाद के काव्य-संग्रह 'लहर' की समीक्षा

जयशंकर प्रसाद के काव्य-संग्रह 'लहर' की समीक्षा

1. संग्रह का परिचय एवं ऐतिहासिक स्थान

'लहर' जयशंकर प्रसाद का प्रथम काव्य-संग्रह है जो 1918 ई. में प्रकाशित हुआ। यह संग्रह छायावाद के उदय काल की महत्वपूर्ण कृति है और प्रसाद की काव्यात्मक यात्रा का प्रारंभिक बिंदु है। 'लहर' में प्रसाद के प्रारंभिक काव्य-रूपों की झलक मिलती है, जो बाद में 'कामायनी' जैसे महाकाव्य में परिपक्व हुए।

2. प्रमुख विषय-वस्तु एवं स्वर

क) प्रकृति चित्रण:

· प्रकृति को सजीव और मानवीय संवेदनाओं के साथ चित्रित किया गया है।
· उदाहरण: "पर्वतों में हिमालय सबसे ऊँचा, उसका हृदय भी बर्फ सा साफ है।"
· प्रतीकात्मकता: प्रकृति के माध्यम से मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति।

ख) प्रेम और सौंदर्य:

· आध्यात्मिक प्रेम और भौतिक प्रेम का समन्वय।
· नारी सौंदर्य का आदर्शवादी और रहस्यमय चित्रण।
· प्रेम को विरह और मिलन की अनुभूतियों के साथ प्रस्तुत किया गया है।

ग) दार्शनिकता:

· जीवन, मृत्यु और अस्तित्व के प्रश्न।
· वेदना और करुणा की गहरी अनुभूति।
· अनंत की खोज और मानवीय सीमाओं का बोध।

घ) राष्ट्रीय भावना:

· सांस्कृतिक गौरव की अभिव्यक्ति।
· भारतीय परंपरा और इतिहास के प्रति आस्था।
· उदाहरण: "हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती"।

3. काव्यगत विशेषताएँ

क) भाषा-शैली:

· खड़ी बोली का काव्यात्मक प्रयोग।
· संस्कृतनिष्ठ शब्दावली और तत्सम शब्दों का प्रयोग।
· लयात्मकता और संगीतात्मकता।
· अलंकारों का सहज प्रयोग: उपमा, रूपक, अनुप्रास।

ख) छंद योजना:

· मुक्तछंद और पारंपरिक छंदों का समन्वय।
· गीतात्मकता और प्रभावी पद्य रचना।

ग) बिंब विधान:

· प्रकृति बिंब: पर्वत, नदियाँ, बादल, फूल।
· दार्शनिक बिंब: अंधकार-प्रकाश, सागर-लहर।
· भावनात्मक बिंब: आँसू, मुस्कान, विरह-वेदना।

4. प्रमुख रचनाएँ एवं उनका विश्लेषण

क) 'हिमाद्रि तुंग शृंग से':

· राष्ट्रीय चेतना का उत्कृष्ट उदाहरण।
· हिमालय को भारतीय संस्कृति के प्रतीक के रूप में चित्रित।
· ऐतिहासिक गौरव और सांस्कृतिक विरासत का गान।

ख) 'आँसू' (संग्रह का प्रसिद्ध खंड):

· विरह और वेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति।
· प्रेम की त्रासदी और भावनात्मक गहराई।
· "आँसू" शीर्षक से ही करुण रस की प्रधानता।

ग) प्रकृति गीत:

· प्रकृति के माध्यम से आंतरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति।
· ऋतु वर्णन और प्राकृतिक दृश्यों का काव्यात्मक चित्रण।

5. छायावादी विशेषताएँ

अनुभूति की प्रधानता:

· व्यक्तिगत अनुभूतियों की अभिव्यक्ति।
· अंतर्मुखी दृष्टि और स्वच्छंद भावुकता।

प्रतीक और रहस्य:

· अप्रस्तुत योजना द्वारा भावों की अभिव्यक्ति।
· रहस्यमयता और गूढ़ अर्थों की प्रधानता।

मानवीकरण:

· प्रकृति और निर्जीव वस्तुओं को मानवीय गुणों से युक्त करना।

6. 'लहर' का साहित्यिक महत्व

ऐतिहासिक महत्व:

· छायावाद के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका।
· खड़ी बोली काव्य को परिपक्वता की ओर अग्रसर करना।
· प्रगतिशील काव्य धारा का प्रारंभिक स्वरूप।

कलात्मक महत्व:

· भाव और कला का सुंदर समन्वय।
· हिंदी काव्य में नए प्रयोगों का आरंभ।
· गीत और प्रबंध काव्य के बीच का सेतु।

7. समकालीन संदर्भ में मूल्यांकन

शक्तियाँ:

· भावों की गहनता और काव्यात्मक संवेदनशीलता।
· भाषा की सर्जनात्मकता और शिल्प का सौंदर्य।
· भारतीय चेतना और आधुनिकता का समन्वय।

सीमाएँ (आलोचनात्मक दृष्टि):

· कुछ रचनाओं में अति-भावुकता।
· संस्कृतनिष्ठ भाषा से सामान्य पाठक के लिए कठिनाई।
· दार्शनिकता कहीं-कहीं अमूर्त हो गई है।

8. 'कामायनी' के साथ तुलना

पैरामीटर 'लहर' 'कामायनी'
काल प्रारंभिक रचनाएँ (1918) परिपक्व रचना (1936)
विस्तार लघु रचनाओं का संग्रह एकीकृत महाकाव्य
दार्शनिकता प्रारंभिक और आंशिक गहन और व्यवस्थित
कलेवर विविध विषयों पर लघु रचनाएँ एक सुसंगत कथा के रूप में विस्तृत
छायावादी तत्व प्रारंभिक और प्रयोगात्मक परिपक्व और स्थापित

9. निष्कर्ष

'लहर' जयशंकर प्रसाद की काव्य-साधना का प्रथम और महत्वपूर्ण चरण है। यह संग्रह न केवल छायावाद के विकास में मील का पत्थर है, बल्कि सम्पूर्ण हिंदी काव्य-परंपरा में एक क्रांतिकारी संग्रह के रूप में स्वीकृत है।

इस संग्रह की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ:

1. खड़ी बोली को काव्य की सशक्त भाषा के रूप में स्थापित करना।
2. व्यक्तिगत अनुभूतियों को काव्य का विषय बनाना।
3. पश्चिमी प्रभावों के बीच भारतीय चेतना को बनाए रखना।
4. रहस्य और प्रतीक के माध्यम से काव्य की नई भाषा गढ़ना।

'लहर' केवल काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि एक युग का सांस्कृतिक दस्तावेज है जो भारतीय नवजागरण और साहित्यिक क्रांति के संधि-बिंदु पर खड़ा है। प्रसाद की यह प्रारंभिक कृति उनकी काव्य-यात्रा की नींव है, जिस पर बाद में 'कामायनी' जैसा विश्वकोशीय महाकाव्य खड़ा हुआ।

साहित्यिक विरासत के रूप में, 'लहर' आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह मानवीय संवेदनाओं, प्रकृति-प्रेम और आध्यात्मिक खोज के उन सार्वभौमिक पहलुओं को छूती है जो हर युग में प्रासंगिक रहते हैं।

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