मेरे अधिकार कहां है कविता की समीक्षा कीजिए
जयप्रकाश कर्दम की यह कविता एक तीखा सामाजिक–राजनीतिक प्रश्न उठाती है, जो भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत और वर्गीय विषमताओं, शोषण और वंचित समूहों के अधिकारों के हनन की पीड़ा को व्यक्त करती है। यह कविता केवल व्यक्तिगत विषाद नहीं, बल्कि एक सामूहिक चेतना का आवाज़ बनकर उभरती है।
कविता की समीक्षा के प्रमुख बिंदु:
1. विषय-वस्तु और संदर्भ:
· कविता सामाजिक–आर्थिक असमानता, जाति–वर्ण व्यवस्था के ढाँचे में शोषण, और संवैधानिक अधिकारों के व्यवहारिक अभाव की पीड़ा को केंद्र में रखती है।
· यह उन लोगों की आवाज़ है जो सदियों से "श्रम की भट्ठी" में जलते रहे हैं, जिनकी आवाज़ पर "ताले" लगे हैं।
· रामराज्य, हिन्दुत्व, शम्बूक वध जैसे प्रतीकों के माध्यम से यह सांस्कृतिक–धार्मिक वर्चस्ववाद पर भी प्रहार करती है।
2. भाषा और शैली:
· भाषा आक्रोश और विद्रोह से भरी है, परंतु नियंत्रित और काव्यात्मक।
· ‘तुम’ और ‘मैं’ के द्वंद्वात्मक प्रयोग से पूरे समाज की विभाजन रेखा स्पष्ट होती है।
· प्रश्नात्मक शैली पूरी कविता में बनी रहती है, जो पाठक को झकझोरती है और उत्तर माँगती है।
· ‘कोठी-बँगले’ vs ‘झोपड़ पट्टी’, ‘दूध-मलाई’ vs ‘रोटी का मुहताज’ – इन द्वंद्वों के माध्यम से आर्थिक विषमता को बहुत सटीक रूप में चित्रित किया गया है।
3. प्रतीक और बिंदु:
· शम्बूक की गर्दन: शम्बूक (एक दलित चरित्र) की हत्या की पौराणिक कथा के माध्यम से दलितों के ऊपर होने वाली ऐतिहासिक हिंसा और दमन की ओर संकेत।
· हिन्दुत्व राज्य की नगरी: साम्प्रदायिक और जातिवादी राजनीति के बीच दलितों/शोषितों के लिए ‘घर-द्वार’ का अभाव।
· मौलिक अधिकार: संविधान में दिए गए अधिकारों और वास्तविकता के बीच की विसंगति को रेखांकित करना।
4. सामाजिक–राजनीतिक टिप्पणी:
· कविता एक ऐसे समाज पर प्रश्नचिह्न लगाती है जो “समता का संसार” और “मैत्री की मीनार” का दावा करता है, परंतु व्यवहार में “वैषम्य-द्वेष के बीहड़” को पालता है।
· यह उस “परम्परा” को अस्वीकार करती है जो शूद्र/दलित को सदा के लिए नीचा रखने और शम्बूकों की गर्दन काटने का इतिहास रचती है।
· अंतिम पंक्तियाँ—“मैं न मुर्दा हूँ न ही जी सकता”—एक ऐसी ट्रैजिक स्थिति को दर्शाती हैं जहाँ व्यक्ति न तो मर ही पा रहा है न जी ही पा रहा है, यानी व्यवस्था ने उसे मानवीय अस्तित्व से ही वंचित कर दिया है।
5. समग्र प्रभाव:
यह कविताएक विरोध और आवाज़ की कविता है। यह दलित चेतना और वंचित वर्गों के संघर्ष का साहित्यिक दस्तावेज है। कवि ने अपनी पीड़ा को केवल शिकायत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामाजिक न्याय, गरिमा और मानवाधिकारों के प्रति एक दार्शनिक और राजनीतिक दृष्टि प्रदान की है।
निष्कर्ष:
जयप्रकाश कर्दम कीयह कविता समकालीन हिंदी दलित कविता की एक महत्वपूर्ण कृति है। यह सामाजिक यथार्थ को बिना लाग–लपेट के प्रस्तुत करती है और पाठक से सवाल करती है कि क्या वास्तव में हम एक न्यायपूर्ण, समतामूलक समाज की रचना कर पाए हैं। कविता की ताकत इसकी प्रामाणिकता और प्रतिरोध की भाषा में है, जो हर पाठक को झकझोर कर रख देती है।
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