झरना - जयशंकर प्रसाद : काव्य समीक्षा

झरना - जयशंकर प्रसाद : काव्य समीक्षा

कवि का संक्षिप्त परिचय:

जयशंकर प्रसाद (1889-1937) छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ हैं जिन्होंने हिंदी कविता, नाटक और कहानी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। उनकी काव्य-भाषा में संस्कृतनिष्ठता, अलंकारिकता और गहन दार्शनिक चिंतन का अनूठा समन्वय मिलता है।

कविता 'झरना' का सार:

यह कविता प्रसाद जी के काव्य संग्रह 'झरना' (1918) की शीर्षक कविता है जिसमें एक झरने के माध्यम से जीवन, सृष्टि और मानवीय भावनाओं के गहरे प्रतीकात्मक अर्थ उभारे गए हैं। झरना यहाँ केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, बल्कि जीवन-प्रवाह, अस्तित्व के रहस्य और काव्य-सृजन का प्रतीक बन जाता है।

प्रमुख विशेषताएँ एवं समीक्षा:

1. प्रतीकात्मकता एवं अर्थ-गाम्भीर्य:

· झरना जीवन के अविरल प्रवाह का प्रतीक है - "झर-झर मधुर तान सुनाता झरना / कहता जग का गान गाता झरना"
· यह काल की गतिशीलता का द्योतक है - "चल रहा किस ओर, रुकता कहीं नहीं"
· सृजन और विनाश के चक्र का प्रतिबिंब - "गिर-गिरकर चूमता है पात / उठ-उठकर गिरता है साथ"

2. छायावादी विशेषताएँ:

· रहस्यवादी भाव-भूमि: झरने में अनंत का दर्शन - "अनंत की ओर ले जाता झरना"
· प्रकृति के माध्यम से आत्मानुभूति: प्रकृति मानवीय भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनी है।
· कोमल कल्पना एवं माधुर्य: "मधुर तान", "मृदुल गति", "सुखद स्वर" जैसे शब्दों से कविता संगीतमय बन गई है।

3. भाषा-शैली एवं अलंकार:

· संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली: परिष्कृत भाषा में भी प्रवाहमयता - "मृदुल मलयानिल, जाग रहा तरु दल, छिटकाता जल"
· अनुप्रास की सार्थकता: "झर-झर", "उठ-उठ", "गिर-गिर" से ध्वन्यात्मकता।
· मानवीकरण अलंकार: झरने को गान गाते, कहानी कहते हुए चित्रित किया गया है।
· प्रश्नात्मक शैली: "चल रहा किस ओर?" - पाठक को चिंतन के लिए प्रेरित करती है।

4. दार्शनिक पहलू:

· गतिशीलता का दर्शन: सृष्टि सतत परिवर्तनशील है।
· लय एवं संगीत की अवधारणा: पूरा ब्रह्मांड संगीतमय है।
· अनंत की खोज: मानव मन सीमित से असीम की ओर यात्रा करता है।

5. संरचना एवं छंद:

· मुक्त छंद के निकट प्रवाहमय रचना।
· आंतरिक लय एवं संगीतात्मकता।
· दृश्य बिंबों की श्रृंखला जो एक संपूर्ण चित्र उपस्थित करती है।

काव्य-पंक्तियों का विश्लेषण:

"मृदुल मलयानिल, जाग रहा तरु दल
छिटकाता जल, फेनिल उर्मि विलोल"

इन पंक्तियों में प्रसाद जी ने प्रकृति का सूक्ष्म अवलोकन प्रस्तुत किया है। मलयानिल की मृदुलता, पत्तों का हिलना, जल का छिटकना और लहरों की फेनिल गति एक जीवंत चित्र उपस्थित करती है।

छायावाद में 'झरना' का स्थान:

यह कविता छायावाद के प्रकृति-चित्रण, रहस्यभावना और प्रतीकात्मकता के तत्वों को पूर्णतः प्रतिबिंबित करती है। प्रसाद ने झरने जैसी साधारण प्राकृतिक घटना में विश्व-ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्य देखे हैं।

आलोचनात्मक दृष्टि:

· शक्ति: गहन प्रतीकात्मकता, दार्शनिक गाम्भीर्य, भाषिक सौंदर्य।
· संभावित आलोचना: अति-दार्शनिकता के कारण सामान्य पाठक के लिए कुछ अंश दुरूह हो सकते हैं। संस्कृतनिष्ठ भाषा आधुनिक पाठक से दूरी बना सकती है।

सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ:

राष्ट्रीय जागरण के दौर में लिखी इस कविता में गतिशीलता और प्रगति का आह्वान भी निहित है। झरने का अविरल प्रवाह भारतीय समाज में नवचेतना के प्रसार का प्रतीक बन जाता है।

निष्कर्ष:

'झरना' जयशंकर प्रसाद की काव्य-कला का उत्कृष्ट उदाहरण है जहाँ प्रकृति वर्णन, दार्शनिक चिंतन और कलात्मक अभिव्यक्ति का सुंदर समन्वय हुआ है। यह कविता छायावादी काव्यधारा की एक मील का पत्थर है जो हिंदी साहित्य को गहराई और गरिमा प्रदान करती है। प्रसाद ने इसमें भारतीय काव्य परंपरा और आधुनिक चेतना के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण किया है।

इस कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह प्रकृति के माध्यम से अध्यात्म तक की यात्रा कराती है और पाठक को जीवन के प्रवाहमय स्वरूप का अनुभव कराती है।

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