अनुवाद: अर्थ, परिभाषा एवं व्युत्पत्ति
अनुवाद: अर्थ, परिभाषा एवं व्युत्पत्ति
1. अनुवाद का अर्थ
अनुवाद का मूल अर्थ है एक भाषा से दूसरी भाषा में अर्थपूर्ण रूपांतरण। यह केवल शब्दों का हस्तांतरण नहीं, बल्कि भाव, विचार, संस्कृति और संदर्भ का सांस्कृतिक पुल निर्माण करने की प्रक्रिया है। अनुवाद में मूल पाठ की विषयवस्तु, शैली और प्रभाव को समान रूप से दूसरी भाषा में प्रस्तुत करना होता है।
2. अनुवाद की परिभाषा
विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएँ:
· भाषाविद् जे.सी. कैटफोर्ड के अनुसार:
"अनुवाद एक भाषा के पाठ की सामग्री को दूसरी भाषा के तुल्य पाठ से प्रतिस्थापित करना है।"
· भारतीय दृष्टिकोण से:
"अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसमें एक भाषा (स्रोत भाषा) में व्यक्त विचारों, भावों एवं सूचनाओं को दूसरी भाषा (लक्ष्य भाषा) में उसी प्रभाव के साथ अभिव्यक्त किया जाता है।"
· कार्यात्मक परिभाषा:
अनुवाद एक सृजनात्मक और विश्लेषणात्मक क्रिया है जिसमें भाषाई, सांस्कृतिक और प्रासंगिक तत्वों का सूक्ष्म समन्वय आवश्यक होता है।
3. अनुवाद शब्द की व्युत्पत्ति
· संस्कृत मूल: "अनुवाद" शब्द संस्कृत धातु "वद्" (कहना/बोलना) में "अनु" उपसर्ग जोड़ने से बना है।
· शाब्दिक अर्थ:
· अनु = पीछे, अनुसरण, पुनः
· वाद = कथन, बोलना
→ अर्थ: "पुनः कहना", "दोहराना" या "अनुकरण करते हुए कहना"।
· ऐतिहासिक विकास:
प्राचीन भारत में इसे "भाषांतर" (भाषा का दूसरे रूप में परिवर्तन) कहा जाता था। बाद में "अनुवाद" शब्द ने इसका स्थान ले लिया।
· दार्शनिक आधार:
यह शब्द इस अवधारणा को दर्शाता है कि अनुवादक मूल रचना का अनुसरण करते हुए उसके अर्थ को नई भाषा में पुनर्सृजित करता है, न कि केवल नकल करता है।
सारांश:
अनुवाद एक सांस्कृतिक-भाषाई माध्यम है जो मूल पाठ के सार को दूसरी भाषा के शब्दों, मुहावरों और सांस्कृतिक संदर्भों में ढालता है। "अनुवाद" शब्द की व्युत्पत्ति इसके पुनः अभिव्यक्ति के स्वभाव को प्रकट करती है, जहाँ अनुवादक मूल भाव का अनुगमन करते हुए भी लक्ष्य भाषा की सृजनशीलता का प्रयोग करता है। यह कला और विज्ञान दोनों ही है।
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