'मैं कहानी क्यों लिखता हूं' - मोहन राकेश के निबंध की समीक्षा

'मैं कहानी क्यों लिखता हूं' - मोहन राकेश के निबंध की समीक्षा

मोहन राकेश हिंदी साहित्य के प्रमुख कथाकार और नाटककार थे जिनकी रचनाएँ नई कहानी आंदोलन का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका यह आत्मव्यक्तिपरक निबंध लेखकीय अंतर्दृष्टि और रचनात्मक प्रक्रिया को समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

निबंध के प्रमुख बिंदु:

1. रचनात्मकता का मनोविज्ञान: राकेश कहानी लेखन को केवल शौक या पेशा नहीं, बल्कि एक आंतरिक अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे बताते हैं कि लेखन उनके लिए आत्म-अन्वेषण और अस्तित्व की तलाश का माध्यम है।
2. सामाजिक सरोकार: लेखक ने स्पष्ट किया है कि उनकी रचनाएँ समकालीन सामाजिक यथार्थ से जुड़ी हैं। वे मानवीय संबंधों, संघर्षों और विसंगतियों को अभिव्यक्त करने के लिए लिखते हैं।
3. साहित्यिक दृष्टिकोण: निबंध में राकेश ने 'कला कला के लिए' और 'कला जीवन के लिए' के द्वंद्व पर अपना स्पष्ट मत दिया है। उनके लिए कहानी समाज में सार्थक हस्तक्षेप का साधन है।
4. शिल्प और अभिव्यक्ति: राकेश ने भाषा और शिल्प के प्रयोग पर बल दिया है। वे मानते हैं कि नए विषयों और अनुभवों के लिए नए शिल्प की आवश्यकता होती है।

निबंध की विशेषताएँ:

1. वैचारिक स्पष्टता: निबंध में राकेश की साहित्यिक मान्यताएँ सुस्पष्ट रूप से व्यक्त हुई हैं। वे लेखक की सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति सजग हैं।
2. आत्मीय शैली: भाषा गंभीर होते हुए भी संवादात्मक है। पाठक से सीधा संवाद स्थापित करने की शैली निबंध को रोचक बनाती है।
3. सैद्धांतिक आधार: निबंध में उनकी साहित्यिक समझ का सैद्धांतिक आधार मिलता है, जो उनकी रचनाओं को बेहतर ढंग से समझने में सहायक है।

सीमाएँ:

1. कुछ आलोचक मानते हैं कि यह निबंध व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित है और साहित्यिक सिद्धांतों की व्यापक चर्चा नहीं करता।
2. निबंध में राजनीतिक संदर्भों और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कमी खलती है।

महत्व:

यह निबंध न केवल मोहन राकेश की रचनात्मक प्रेरणाओं को समझने का आधार है, बल्कि हिंदी के नए कथाकारों के लिए भी एक प्रेरक दस्तावेज है। इससे पाठक को यह समझने में मदद मिलती है कि एक संवेदनशील रचनाकार कैसे अपने परिवेश और अनुभवों को साहित्य में रूपांतरित करता है।

निष्कर्ष: 'मैं कहानी क्यों लिखता हूं' निबंध मोहन राकेश की साहित्यिक चेतना और प्रतिबद्धता का प्रामाणिक दस्तावेज है। यह निबंध हिंदी आत्मकथ्यात्मक निबंधों की समृद्ध परंपरा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है जो लेखक और पाठक के बीच एक विशेष संवाद स्थापित करता है। राकेश की यह रचना साहित्यिक आत्मसाक्षात्कार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जो रचनाकार की मानसिक प्रक्रिया को समझने में सहायक है।

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