हिंदी फिल्मों में गीत और गजल का महत्व" नाम -प्रो डॉ. संघप्रकाश दुड्डे,हिंदीविभागाध्यक्ष, संगमेश्वर कॉलेज, सोलापुर
"हिंदी फिल्मों में गीत और गजल का महत्व"
नाम -प्रो डॉ. संघप्रकाश दुड्डे,
हिंदीविभागाध्यक्ष, संगमेश्वर कॉलेज, सोलापुर।
शोध आलेख का सारांश
हिंदी सिनेमा में गीत और ग़ज़ल ने केवल मनोरंजन का ही माध्यम नहीं बनाया, बल्कि वे फिल्म की आत्मा, चरित्रों के मनोभावों के वाहक, और सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के दस्तावेज़ बन गए हैं। यह शोध आलेख इसी महत्व की पड़ताल करता है। आलेख में यह दर्शाया गया है कि कैसे हिंदी फिल्मों के गीतों ने भारतीय जनमानस की सामूहिक भावनाओं को स्वर दिया और कैसे ग़ज़ल ने इसके सौंदर्यबोध को शास्त्रीय गंभीरता एवं काव्यात्मक गहराई प्रदान की। फिल्मों के इतिहास को 'टॉकीज' के दौर से लेकर वर्तमान तक यात्रा करते हुए, इसमें प्रमुख संगीतकारों, गीतकारों, गायकों के योगदान और गीत-ग़ज़लों के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। निष्कर्षतः, यह स्थापित किया गया है कि गीत और ग़ज़ल हिंदी सिनेमा की पहचान के अविभाज्य अंग हैं, जो उसे एक विशिष्ट सांस्कृतिक उत्पाद बनाते हैं।
बीज शब्द
हिंदी सिनेमा, फिल्मी गीत, ग़ज़ल, संगीत, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, मनोरंजन, भावनात्मक संप्रेषण, साहित्यिक प्रभाव, सामाजिक प्रतिबिंब, संगीतकार, गीतकार।
प्रस्तावना
हिंदी सिनेमा, जिसे अक्सर 'बॉलीवुड' के नाम से जाना जाता है, विश्व सिनेमा की एक अनूठी घटना है। इसकी अनूठेपन का एक प्रमुख स्तंभ है – इसका संगीत, विशेषकर इसके गीत और ग़ज़लें। भारतीय सिनेमा का जन्म ही 'आलम आरा' (1931) जैसी बोलती फिल्म के साथ हुआ, जिसने पर्दे पर गीतों को जन्म दिया। तब से लेकर आज तक, फिल्मी गीत भारतीय जीवन के ताने-बाने में इस तरह रच-बस गए हैं कि उनके बिना हिंदी फिल्म की कल्पना अधूरी है। ये गीत केवल फिल्म की कथा को आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि वे दर्शकों से भावनात्मक स्तर पर जुड़ते हैं, उनकी अपनी खुशी, गम, प्रेम और विरह की अभिव्यक्ति बन जाते हैं।
ग़ज़ल, जो मूलतः फारसी और उर्दू की एक शास्त्रीय काव्य विधा रही है, ने हिंदी सिनेमा में प्रवेश करके इसके सौंदर्यशास्त्र को समृद्ध किया है। यह विधा अपने लयबद्ध शे'र, गहन भावबोध और सूक्ष्म अर्थछवियों के कारण सिनेमा को एक साहित्यिक गरिमा प्रदान करती है। इस शोध आलेख का उद्देश्य हिंदी फिल्मों में गीत और ग़ज़ल के ऐतिहासिक विकास, उनके सांस्कृतिक-सामाजिक महत्व और कलात्मक योगदान का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करना है
शोध आलेख का विश्लेषण
1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और विकास यात्रा हिंदी फिल्म संगीत का प्रारंभिक दौर (1930-40) शास्त्रीय और लोक संगीत की ठोस नींव पर टिका था। संगीतकारों जैसे पंकज मलिक, अनिल बिस्वास और नौशाद ने रागों को फिल्मी धुनों में ढालना शुरू किया। 1950 और 60 का दशक हिंदी फिल्म संगीत का 'स्वर्ण युग' माना जाता है। इस दौरान एस.डी. बर्मन, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ.पी. नैयर जैसे संगीतकारों और शकील बदायूंनी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, हसरत जयपुरी जैसे गीतकारों ने मिलकर ऐसे गीत रचे जो आज भी अमर हैं। यह वह दौर था जब ग़ज़ल ने फिल्मों में अपनी पैठ बनाई। मदन मोहन को 'ग़ज़लों का जादूगर' कहा गया, जिन्होंने "लग जा गले", "मैं यहाँ से कहाँ" जैसी ग़ज़लों के माध्यम से विरह और दर्द को अभिव्यक्त किया।
1970-80 के दशक में आर.डी. बर्मन ने संगीत में पश्चिमी प्रभावों का अद्भुत समन्वय किया, जबकि ग़ज़ल की परंपरा को जारी रखने का काम खय्याम और मोहम्मद ज़हूर 'खय्याम' ने किया। 1990 के दशक से टेक्नोलॉजी के प्रभाव और पश्चिमी पॉप के आगमन के बाद भी, गीतों का महत्व कम नहीं हुआ, बल्कि उनका स्वरूप बदला। आज भी ए.आर. रहमान, विशाल-शेखर जैसे संगीतकार फिल्मी गीतों को नई ऊँचाइयाँ दे रहे हैं।
2. गीत का महत्व: भावनाओं का सार्वभौमिक माध्यम
कथा-विकास एवं चरित्र-चित्रण: फिल्मी गीत 'मोंटाज' के रूप में समय और स्थान का संकुचन करते हैं, कहानी को गति देते हैं। जैसे, "ऐ मेरे वतन के लोगों" (क्रांति) में देशभक्ति का भाव एक क्लाइमेक्स बन जाता है। वहीं, "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" (आनंद) चरित्र के अस्तित्ववादी दर्शन को व्यक्त करता है।
· सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिबिंब: फिल्मी गीत अपने समय का दर्पण हैं। भक्ति आंदोलन का प्रभाव "मन तड़पत हरि दर्शन को आज" (बैजू बावरा) में दिखता है, तो नारी अस्मिता की चेतना "चलती का नाम गाड़ी" (मिस्टर नटवरलाल) या "दिल दिया है जान भी देंगे" (कुर्बानी) में मुखर होती है।
· भावनात्मक संप्रेषण एवं स्मृति-निर्माण: गीत दर्शकों की भावनाओं को सीधे संबोधित करते हैं। प्रेम, विरह, विश्वास, निराशा जैसे जटिल भाव एक सरल धुन और मार्मिक शब्दों के जरिए हृदय तक पहुँच जाते हैं। यही कारण है कि शादी, त्योहार, यहाँ तक कि राजनीतिक रैलियों तक में फिल्मी गीतों का प्रयोग होता है।
3. ग़ज़ल का महत्व: सौंदर्यबोध की शास्त्रीय ऊँचाईसाहित्यिक गरिमा एवं काव्यात्मक गहराई: ग़ज़ल ने फिल्म संगीत में उर्दू शायरी की समृद्ध परंपरा को प्रवेश दिया। साहिर, मजरूह, कैफ़ी आज़मी जैसे गीतकारों ने जहाँ गीतों को सरल बनाया, वहीं ग़ज़लों में शे'रों की बारीकी और दार्शनिकता को बरकरार रखा। "चलो एक बार फिर से" (गुमराह) या "वक्त ने किया क्या हसीं सितम" (कागज के फूल) जैसी ग़ज़लें अपने शब्दचयन और अर्थ-गांभीर्य के कारण स्वतंत्र काव्य की तरह भी प्रतिष्ठित हैं। शास्त्रीय संगीत से गहरा नाता: फिल्मी ग़ज़लों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को बड़े पर्दे पर लोकप्रिय बनाया। मदन मोहन, खय्याम, और बाद में जगजीत सिंह (जिन्होंने फिल्मी ग़ज़लों को नया आयाम दिया) ने रागों का ऐसा प्रयोग किया कि ग़ज़ल शास्त्रीयता और लोकप्रियता के बीच सेतु बन गई। लता मंगेशकर, तलत महमूद, मोहम्मद रफी और जगजीत सिंह की आवाज़ ने इन ग़ज़लों को अमर बना दिया।
· गहन भावबोध की अभिव्यक्ति: ग़ज़ल का केंद्रीय भाव 'इश्क' (प्रेम) और 'हसरत' (अभिलाषा) है, जो अक्सर दर्द और विरह के रंग में रंगा होता है। यह विधा उन सूक्ष्म और गहन भावों को व्यक्त करने में सक्षम है, जिन्हें साधारण संवाद या गीत नहीं पकड़ पाते। यह अकेलेपन, अधूरेपन और जीवन की विडंबनाओं को बेहद कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।
4. गीत और ग़ज़ल: एक समन्वयदिलचस्प बात यह है कि हिंदी फिल्मों में गीत और ग़ज़ल के बीच की सीमा रेखा हमेशा द्रवित रही है। कई फिल्मी गीतों में ग़ज़ल का मिज़ाज है (जैसे, "कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है") और कई ग़ज़लों में लोकप्रिय गीतों जैसी पहुँच (जैसे, "होठों से छू लो तुम")। यह समन्वय हिंदी सिनेमा की समावेशी प्रकृति को दर्शाता है, जो उच्च कला और लोक कला के बीच का फासला मिटाता है।
निष्कर्ष निष्कर्षतः, हिंदी फिल्मों में गीत और ग़ज़ल का महत्व केवल संगीत तक सीमित नहीं है; वे भारतीय समाज के सांस्कृतिक-भावनात्मक इतिहास के सजीव दस्तावेज हैं। गीत ने सिनेमा को जन-जन तक पहुँचाया, उसे लोकप्रिय और लोक-सम्पर्की बनाया। वहीं, ग़ज़ल ने इसे सौंदर्य की शास्त्रीय ऊँचाई, भाव की गहराई और साहित्यिक गरिमा प्रदान की। दोनों ने मिलकर हिंदी सिनेमा को एक ऐसा बहुरंगी और बहुआयामी कलात्मक माध्यम बनाया है, जो अपनी सांगीतिक धरोहर पर गर्व करता है। तकनीकी बदलाव और वैश्विक प्रभावों के बावजूद, फिल्मी गीत और ग़ज़ल का जादू आज भी कायम है, क्योंकि वे मनुष्य की मूल भावनाओं – प्रेम, दर्द, आशा और आनंद – का सार्वकालिक और सार्वभौमिक स्वर हैं। भविष्य में भी, यह धरोहर नए रूपों में सिनेमा को समृद्ध करती रहेगी।
संदर्भ ग्रंथ सूचि
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लेखक: प्रो. डॉ. संघप्रकाश दुड्डे,
हिंदीविभागाध्यक्ष,
संगमेश्वर कॉलेज,सोलापुर।
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